हरि-भक्ति-विलास में कहा गया है कि यदि ब्राह्मणical आदेश में कोई योग्य व्यक्ति उपस्थित हो, तो किसी ऐसे व्यक्ति से दीक्षा स्वीकार नहीं करनी चाहिए जो ब्राहमणical आदेश में नहीं है। यह निर्देश उन लोगों के लिए है जो सांसारिक सामाजिक व्यवस्था पर अत्यधिक निर्भर हैं और उन लोगों के लिए उपयुक्त है जो सांसारिक जीवन में बने रहना चाहते हैं। यदि कोई कृष्ण चेतना के सत्य को समझता है और जीवन की पूर्णता के लिए पारमार्थिक ज्ञान प्राप्त करने की गंभीरता से इच्छा रखता है, तो वह किसी भी सामाजिक स्थिति से एक आध्यात्मिक गुरु स्वीकार कर सकता है, बशर्ते कि आध्यात्मिक गुरु कृष्ण के विज्ञान से पूरी तरह परिचित हो। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने यह भी कहा है कि भले ही किसी की स्थिति ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, गृहस्थ या संन्यासी हो, अगर वह कृष्ण के विज्ञान में निपुण है तो वह वर्त्म-प्रदर्शक-गुरु, दीक्षा-गुरु या शिक्षा-गुरु के रूप में आध्यात्मिक गुरु बन सकता है। वह आध्यात्मिक गुरु जो सबसे पहले आध्यात्मिक जीवन के बारे में जानकारी देता है, वर्त्म-प्रदर्शक-गुरु कहलाता है, वह आध्यात्मिक गुरु जो शास्त्रों के नियमों के अनुसार दीक्षा देता है, दीक्षा-गुरु कहलाता है, और वह आध्यात्मिक गुरु जो उन्नति के लिए निर्देश देता है, शिक्षा-गुरु कहलाता है। वास्तव में एक आध्यात्मिक गुरु की योग्यता कृष्ण के विज्ञान के उसके ज्ञान पर निर्भर करती है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह ब्राह्मण, क्षत्रिय, संन्यासी या शूद्र है। श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा दिया गया यह आदेश शास्त्रों के आदेशों के बिल्कुल भी विरुद्ध नहीं है। पद्म पुराण में कहा गया है:
ना शूद्रा भगवद-भक्तास् ते'पि भगवतोत्तमाः
सर्व-वर्णेषु ते शूद्रा ये न भक्ता जनार्दने
जो वास्तव में कृष्ण के आध्यात्मिक ज्ञान में उन्नत है, वह कभी भी शूद्र नहीं है, भले ही वह शूद्र परिवार में पैदा हुआ हो। हालाँकि, भले ही विप्र, या ब्राह्मण, छह ब्राह्मणिक क्रियाओं (पाठन, पाठन, यजन, याजन, दान, प्रतिग्रह) में बहुत जानकार हो और वैदिक भजनों में भी पारंगत हो, लेकिन वह तब तक आध्यात्मिक गुरु नहीं बन सकता जब तक कि वह वैष्णव न हो। लेकिन अगर कोई चंडाल परिवार में पैदा हुआ है लेकिन कृष्ण चेतना में पारंगत है, तो वह गुरु बन सकता है। ये शास्त्रीय निषेधाज्ञाएं हैं, और इन निषेधाज्ञाओं का कड़ाई से पालन करते हुए, श्री चैतन्य महाप्रभु, श्री विश्वम्भर नामक एक गृहस्थ के रूप में, ईश्वर पुरी नामक एक सन्यासी-गुरु द्वारा दीक्षित किए गए थे। इसी तरह, श्री नित्यानंद प्रभु को माधवेंद्र पुरी ने दीक्षा दी थी, जो एक संन्यासी थे। हालाँकि, अन्य लोगों के अनुसार, उन्हें लक्ष्मीपति तीर्थ ने दीक्षा दी थी। अद्वैत आचार्य, हालांकि एक गृहस्थ थे, माधवेंद्र पुरी द्वारा दीक्षित किए गए थे, और श्री रसिकानंद, हालांकि ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे, श्री श्यामानंद प्रभु द्वारा दीक्षित किए गए थे, जो एक जाति ब्राह्मण परिवार में पैदा नहीं हुए थे। ऐसे कई उदाहरण हैं जिनमें एक जन्मजात ब्राह्मण ने उस व्यक्ति से दीक्षा ली जो ब्राह्मण परिवार में पैदा नहीं हुआ था। ब्राह्मणिक लक्षणों को श्रीमद-भागवतम् (7.11.35) में समझाया गया है, जिसमें कहा गया है:
यस्य यल्-लक्षणं प्रोक्तं पुंसो वर्णाभिव्यंजकम्
यदन्यत्रापि दृश्येत तत्तेनैव विनिर्दिशेत्
यदि कोई व्यक्ति शूद्र परिवार में पैदा हुआ है लेकिन उसके पास एक आध्यात्मिक गुरु के सभी गुण हैं, तो उसे न केवल ब्राह्मण के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए बल्कि एक योग्य आध्यात्मिक गुरु के रूप में भी स्वीकार किया जाना चाहिए। यह भी श्री चैतन्य महाप्रभु का निर्देश है। इसलिए श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने सभी वैष्णवों के लिए नियमों और विनियमों के अनुसार पवित्र धागा समारोह की शुरुआत की।
कभी-कभी एक वैष्णव जो एक भजन नंदी है, वह सावित्री-संस्कार (पवित्र धागा दीक्षा) नहीं लेता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इस प्रणाली का उपयोग प्रचार कार्य के लिए किया जाना चाहिए। वैष्णव दो प्रकार के होते हैं - भजन नंदी और गोष्ठ्य-नंदी। भजननंद को प्रचार कार्य में कोई रूचि नहीं है, जबकि गोष्ठ्य-नंद को लोगों को लाभ पहुंचाने और वैष्णवों की संख्या बढ़ाने के लिए कृष्ण चेतना फैलाने में रुचि है। समझा जाता है कि एक वैष्णव ब्राह्मण की स्थिति से ऊपर है। एक प्रचारक के रूप में, उसे ब्राह्मण के रूप में पहचाना जाना चाहिए; अन्यथा वैष्णव के रूप में उसकी स्थिति को लेकर गलतफहमी हो सकती है। हालाँकि, एक वैष्णव ब्राह्मण का चयन उसके जन्म के आधार पर नहीं बल्कि उसके गुणों के अनुसार किया जाता है। दुर्भाग्य से, जो मूर्ख होते हैं वे ब्राह्मण और वैष्णव के बीच का अंतर नहीं जानते। उन्हें यह धारणा है कि जब तक कोई ब्राह्मण नहीं बनता, वह आध्यात्मिक गुरु नहीं बन सकता। केवल इसी कारण से, श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस श्लोक में यह कथन दिया है:
किबा विप्र, किबा न्यासी, शूद्र केने नया
ये कृष्ण-तत्त्व-वेट्टा, सेई 'गुरु' हया
यदि कोई गुरु बन जाता है, तो वह स्वतः ही ब्राह्मण होता है। कभी-कभी एक जाति गुरु कहता है कि ये कृष्ण-तत्त्व-वेट्टा, सेई गुरु हया का अर्थ है कि जो ब्राह्मण नहीं है वह शिक्षा-गुरु या वर्तमा-प्रदर्शन-गुरु बन सकता है लेकिन दीक्षा गुरु नहीं। ऐसे जाति गुरुओं के अनुसार जन्म और पारिवारिक संबंध सबसे पहले माने जाते हैं। हालाँकि, वैष्णव वंशानुगत विचार को स्वीकार नहीं करते हैं। गुरु शब्द वर्तमा-प्रदर्शन-गुरु, शिक्षा-गुरु और दीक्षा-गुरु सभी के लिए समान रूप से लागू होता है। जब तक हम श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा घोषित सिद्धांत को स्वीकार नहीं करते, तब तक यह कृष्ण चेतना आंदोलन पूरी दुनिया में नहीं फैल सकता। श्री चैतन्य महाप्रभु के इरादों के अनुसार, पृथ्वीते आछे यता नगरदि-ग्राम सर्वत्र प्रचार हैबे मोरा नामा। श्री चैतन्य महाप्रभु के पंथ का पूरी दुनिया में प्रचार किया जाना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि लोगों को उनकी शिक्षाओं पर चलना चाहिए और शूद्र या चंडाल बने रहना चाहिए। जैसे ही किसी को एक शुद्ध वैष्णव के रूप में प्रशिक्षित किया जाता है, उसे एक वास्तविक ब्राह्मण के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। यह इस श्लोक में श्री चैतन्य महाप्रभु के निर्देशों का सार है।
