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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 127
 
 
श्लोक  2.8.127 
तोमार ठाञि आइलाङ तोमार महिमा शुनिया ।
तुमि मोरे स्तुति कर ‘सन्न्यासी’ जानिया ॥127॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, "आपकी महिमा सुनकर मैं आपके यहाँ आया हूँ। लेकिन आप एक संन्यासी के सम्मान में मेरी स्तुति कर रहे हैं।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu continued, "I have come to you after hearing about your greatness. But you are praising me, thinking that I am a sannyasi."
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर बताते हैं कि सांसारिक संपदा से लैश एक सांसारिक व्यक्ति को हमेशा पता होना चाहिए कि उन्नत भक्तों की पारलौकिक संपदा अपने जैसे व्यक्ति की भौतिक संपदा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। भौतिक संपदा वाला एक भौतिकवादी व्यक्ति एक पारलौकिक भक्त के सामने बहुत अधिक अभिमानी या घमंडी नहीं होना चाहिए। यदि कोई अपने भौतिक विरासत, संपत्ति, शिक्षा और सुंदरता के बल पर एक पारलौकिक भक्त के पास जाता है और भगवान के उन्नत भक्त का सम्मान नहीं करता है, तो वैष्णव भक्त ऐसे भौतिक रूप से घमंडी व्यक्ति को औपचारिक रूप से सम्मान दे सकता है, लेकिन वह उसे पारलौकिक ज्ञान नहीं दे सकता है। वास्तव में, भक्त उसे अविद्वान या शूद्र के रूप में देखता है। ऐसा घमंडी व्यक्ति कृष्ण के विज्ञान को नहीं समझ सकता है। पारलौकिक जीवन में एक अभिमानी व्यक्ति को धोखा दिया जाता है और मानव रूप प्राप्त करने के बावजूद, वह फिर से नारकीय परिस्थितियों में खिसक जाएगा। अपने व्यक्तिगत उदाहरण के द्वारा, श्री चैतन्य महाप्रभु बताते हैं कि कैसे वैष्णव के सामने विनम्र और विनम्र होना चाहिए, भले ही कोई उच्च पद पर स्थित हो। ऐसा विश्व के आचार्य, सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु और शिक्षक के रूप में श्री चैतन्य महाप्रभु की शिक्षा है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)