श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 125
 
 
श्लोक  2.8.125 
सार्वभौम - सङ्गे मोर मन निर्मल हइल ।
‘कृष्ण - भक्ति - तत्त्व कह ,’ ताँहारे पुछिल ॥125॥
 
 
अनुवाद
"सार्वभौम भट्टाचार्य की संगति से मेरा मन प्रकाशित हो गया। इसलिए मैंने उनसे कृष्ण की दिव्य प्रेममयी सेवा के सत्य के बारे में पूछा।"
 
"My mind has been purified by the association of Sarvabhauma Bhattacharya. That is why I inquired from him about the essence of transcendental loving devotion to Krishna."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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