श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 123
 
 
श्लोक  2.8.123 
हृदये प्रेरण कर, जिह्वाय कहाओ वाणी ।
कि कहिये भाल - मन्द, किछुइ ना जानि ॥123॥
 
 
अनुवाद
"आप मेरे हृदय में प्रेरणा देते हैं और मुझे ज़ुबान से बोलने के लिए प्रेरित करते हैं। मुझे नहीं पता कि मैं अच्छा बोल रहा हूँ या बुरा।"
 
"You inspire me from within my heart and make me speak with my tongue. I don't know whether I am speaking good or bad."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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