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श्लोक 2.8.108  |
एइ दुइ - श्लोकेर अर्थ विचारिले जानि ।
विचारिते उठे येन अमतेर खनि ॥108॥ |
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| अनुवाद |
| "इन दो श्लोकों पर विचार करने मात्र से ही यह समझ में आ जाता है कि ऐसे व्यवहार में कितना अमृत छिपा है। यह बिल्कुल अमृत की खान को मुक्त करने जैसा है।" |
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| "Contemplating just these two verses can explain how much nectar there is in such acts of love. It's like leaving a mine of nectar open." |
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