श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 108
 
 
श्लोक  2.8.108 
एइ दुइ - श्लोकेर अर्थ विचारिले जानि ।
विचारिते उठे येन अमतेर खनि ॥108॥
 
 
अनुवाद
"इन दो श्लोकों पर विचार करने मात्र से ही यह समझ में आ जाता है कि ऐसे व्यवहार में कितना अमृत छिपा है। यह बिल्कुल अमृत की खान को मुक्त करने जैसा है।"
 
"Contemplating just these two verses can explain how much nectar there is in such acts of love. It's like leaving a mine of nectar open."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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