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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.8.1 
सञ्चार्य रामाभिध - भक्त - मेघे स्व - भक्ति - सिद्धान्त - चयामृतानि ।
गौराब्धिरेतैरमुना वितीर्णैस् तज्ज्ञत्व - रत्नालयतां प्रयाति ॥1॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु, जिन्हें गौरांग कहा जाता है, भक्ति के समस्त निर्णायक ज्ञान के सागर हैं। उन्होंने श्री रामानन्द राय को शक्ति प्रदान की, जिन्हें भक्ति के बादल के समान कहा जा सकता है। यह बादल भक्ति के समस्त निर्णायक अर्थों के जल से परिपूर्ण था और सागर द्वारा उसे श्री चैतन्य महाप्रभु के सागर पर इस जल को फैलाने की शक्ति प्रदान की गई। इस प्रकार चैतन्य महाप्रभु का सागर शुद्ध भक्ति के ज्ञान रत्नों से परिपूर्ण हो गया।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu, also known as Gauranga, is the ocean of all theoretical knowledge related to devotion.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)