श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 7: महाप्रभु द्वारा दक्षिण भारत की यात्रा  »  श्लोक 72
 
 
श्लोक  2.7.72 
महानुभावेर चित्तेर स्वभाव एइ हय ।
पुष्प - सम कोमल, कठिन व ज्र - मय ॥72॥
 
 
अनुवाद
एक असाधारण व्यक्तित्व के मन का स्वभाव ऐसा ही होता है। कभी यह फूल की तरह कोमल होता है, तो कभी वज्र की तरह कठोर।
 
Such is the nature of the mind of a great man. Sometimes it is as soft as a flower, and sometimes as hard as a thunderbolt.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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