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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 7: महाप्रभु द्वारा दक्षिण भारत की यात्रा  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  2.7.29 
इँहा - सबार व श प्रभु हये ये ये गुणे ।
दोषारोप - च्छले करे गुण आस्वादने ॥29॥
 
 
अनुवाद
वास्तव में भगवान अपने सभी भक्तों के सद्गुणों से वशीभूत थे। दोष बताने के बहाने उन्होंने उन सभी गुणों का स्वाद चखा।
 
In reality, Mahaprabhu was captivated by the virtues of all his devotees. He savored them under the guise of criticizing them.
तात्पर्य
वास्तव में, श्री चैतन्य महाप्रभु अपने प्रिय भक्तों पर लगाए गए सभी आरोपों से उनके प्रति अपने महान सम्मान को दर्शाते हैं। फिर भी, उन्होंने एक के बाद एक इन दोषों का उल्लेख किया जैसे कि वह उनके गहन स्नेह से नाराज हों। श्री चैतन्य महाप्रभु के व्यक्तिगत सहयोगी कई बार प्रभु के प्रति गहन प्रेमवश नियमों के विपरीत व्यवहार करते थे, और उनके प्रेम के कारण स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु भी कभी-कभी एक संन्यासी के नियमों का उल्लंघन करते थे। जनता की नज़रों में ऐसे उल्लंघन अच्छे नहीं हैं, लेकिन श्री चैतन्य महाप्रभु अपने भक्तों के प्रेम से इतने नियंत्रित थे कि उन्हें कुछ नियम तोड़ने पड़े। हालाँकि उन पर आरोप लगाते हुए, श्री चैतन्य महाप्रभु अप्रत्यक्ष रूप से संकेत दे रहे थे कि वह ईश्वर के प्रति उनके विशुद्ध प्रेम में उनके व्यवहार से बहुत संतुष्ट थे। इसलिए पद २७ में उन्होंने उल्लेख किया कि उनके भक्त और सहयोगी सामाजिक शिष्टाचार से अधिक महत्व कृष्ण के प्रेम को देते हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं जब पिछले आचार्यों ने भक्ति सेवा की, जिन्होंने कृष्ण के प्रति गहन प्रेम में तल्लीन होने पर सामाजिक व्यवहार की परवाह नहीं की। दुर्भाग्य से, जब तक हम इस भौतिक दुनिया में हैं, हमें आलोचना से बचने के लिए सामाजिक रीति-रिवाजों का पालन करना चाहिए। यही श्री चैतन्य महाप्रभु की इच्छा है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)