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श्लोक 2.7.29  |
इँहा - सबार व श प्रभु हये ये ये गुणे ।
दोषारोप - च्छले करे गुण आस्वादने ॥29॥ |
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| अनुवाद |
| वास्तव में भगवान अपने सभी भक्तों के सद्गुणों से वशीभूत थे। दोष बताने के बहाने उन्होंने उन सभी गुणों का स्वाद चखा। |
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| In reality, Mahaprabhu was captivated by the virtues of all his devotees. He savored them under the guise of criticizing them. |
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