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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 7: महाप्रभु द्वारा दक्षिण भारत की यात्रा  »  श्लोक 152
 
 
श्लोक  2.7.152 
श्रद्धा क रि’ एइ लीला ये करे श्रवण ।
अचिराते मिलये तारे चैतन्य - चरण ॥152॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य श्री चैतन्य महाप्रभु की इन लीलाओं को बड़ी श्रद्धा से सुनता है, वह शीघ्र ही भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों को प्राप्त कर लेता है।
 
Whoever listens to these pastimes of Sri Chaitanya Mahaprabhu with utmost devotion will immediately attain His lotus feet.
तात्पर्य
जब कोई व्यक्ति वास्तव में श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से कृष्ण के विचारों के साथ अपनी चेतना को पुनर्जीवित करता है, तो वह अपने आध्यात्मिक जीवन को पुनर्जीवित करता है और प्रभु की सेवा के प्रति समर्पित हो जाता है। तभी वह एक आचार्य के रूप में कार्य कर सकता है। दूसरे शब्दों में, सभी को श्री चैतन्य महाप्रभु के पदचिह्नों पर चलते हुए प्रचार में संलग्न होना चाहिए। इस तरह से भगवान कृष्ण द्वारा उनकी बहुत सराहना की जाएगी और वह शीघ्र ही उनके द्वारा पहचाना जाएगा। दरअसल श्री चैतन्य महाप्रभु के एक भक्त को प्रभु के अनुयायियों को बढ़ाने के लिए प्रचार में संलग्न होना चाहिए। इस प्रकार से वास्तविक वैदिक ज्ञान का दुनिया भर में प्रचार करके, कोई भी सभी मानव जाति को लाभ पहुंचाएगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)