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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 7: महाप्रभु द्वारा दक्षिण भारत की यात्रा  »  श्लोक 129
 
 
श्लोक  2.7.129 
कभु ना बाधिबे तोमार विषय - तरङ्ग ।
पुनरपि एइ ठाञि पाबे मोर सङ्ग ॥129॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने ब्राह्मण कूर्म को आगे सलाह दी, "यदि तुम इस निर्देश का पालन करोगे, तो तुम्हारा भौतिकवादी गृहस्थ जीवन तुम्हारी आध्यात्मिक उन्नति में बाधा नहीं बनेगा। यदि तुम इन नियमों का पालन करोगे, तो हम यहाँ पुनः मिलेंगे, या यूँ कहें कि तुम मेरी संगति कभी नहीं खोओगे।"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu also advised Kurma Brahmin, "If you follow this instruction, your household life will not hinder your spiritual progress. If you follow these rules, we will meet here again, or you will never leave me."
तात्पर्य
यह प्रत्येक के लिए एक अवसर है। अगर कोई केवल अपने प्रतिनिधि के मार्गदर्शन में, श्री चैतन्य महाप्रभु के निर्देशों का पालन करता है और हरे कृष्ण मंत्र का जाप करता है, जहाँ तक संभव हो हर किसी को इसी सिद्धांत को सिखाता है, तो भौतिकवादी जीवन शैली का दूषित होना उसे स्पर्श तक नहीं करेगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई वृंदावन, नवद्वीप या जगन्नाथपुरी जैसे पवित्र स्थान में रहता है या यूरोपीय शहरों के बीच में, जहाँ भौतिकवादी जीवन शैली बहुत प्रमुख है। यदि भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु के निर्देशों का पालन करता है, तो वह भगवान के साथ रहता है। वह जहाँ भी रहता है, वह उस जगह को वृंदावन और नवद्वीप में बदल देता है। इसका अर्थ है कि भौतिकवाद उसे स्पर्श नहीं कर सकता। कृष्ण चेतना में आगे बढ़ने के लिए सफलता का यही रहस्य है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)