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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 89
 
 
श्लोक  2.6.89 
आचार्य कहे , - “वस्तु - विषये हय वस्तु - ज्ञान ।
वस्तु - तत्त्व - ज्ञान हय कृपाते प्रमाण” ॥89॥
 
 
अनुवाद
गोपीनाथ आचार्य ने उत्तर दिया, "परम सत्य का ज्ञान, परम भगवान की दया का प्रमाण है।"
 
Gopinath Acharya replied, “Knowledge of the ultimate truth that brings the greatest welfare is the proof of God's grace.”
तात्पर्य
सर्वभौम भट्टाचार्य ने अपने साले, गोपीनाथ आचार्य को सूचित किया, "सर्वोच्च भगवान् व्यक्तित्व ने मुझ पर दया नहीं दिखाई होगी, लेकिन आपके प्रति दया दिखाने का क्या प्रमाण है? कृपया हमें इस बारे में बताएं।" इसके जवाब में, गोपीनाथ आचार्य ने कहा कि परम कल्याण, परम सत्य और उनकी विभिन्न शक्तियाँ समान हैं। इसलिए कोई भी परम सत्य के तत्व को उनकी विभिन्न शक्तियों की अभिव्यक्ति से समझ सकता है। परम कल्याण में एक इकाई में सभी शक्तियां शामिल हैं। विभिन्न विशेषताओं के साथ संयुक्त परम सत्य मूल तत्व है (वास्तू): परस्य शक्तिर्विविधेव श्रूयते।

इस प्रकार वेद बताते हैं कि परम सत्य में अलग-अलग शक्तियाँ हैं। जब कोई परम सत्य की शक्तियों की विशेषताओं को समझता है, तो वह परम सत्य से अवगत हो जाता है। भौतिक प्लेटफ़ॉर्म पर भी, कोई इसके लक्षणों की अभिव्यक्ति से पदार्थ को समझ सकता है। उदाहरण के लिए, जब गर्मी होती है, तो समझना होगा कि आग है। आग की गर्मी को सीधे तौर पर महसूस किया जाता है। आग दिखाई नहीं दे सकती है, लेकिन कोई गर्मी को महसूस करके आग को ढूंढ सकता है। इसी तरह, यदि कोई परम सत्य की विशेषताओं को समझ सकता है, तो हम जान सकते हैं कि उसने भगवान की दया से परम सत्य के सार को समझा है।

भगवद-गीता (7.25) में कहा गया है, नाहं प्रकाशः सर्वस्य: सर्वोच्च भगवान् व्यक्तित्व सभी के सामने प्रकट न होने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं। सेवोनमुखे हि जिह्वादौ स्वयं एव स्फुरत्यदः: "भगवान स्वयं को एक भक्त को तब प्रकट करता है जब वह भक्त की सेवा से पूरी तरह संतुष्ट होता है।" इस प्रकार कोई भी भगवान की दया के बिना परमेश्वर को समझ नहीं सकता। परम सत्य को अटकलों से नहीं समझा जा सकता, और यह भगवद्गीता का निष्कर्ष है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)