नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन
यं एवैष वृणुते तेन लभ्यः
तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम्
और कठोपनिषद् (1.2.9) में भी कहा गया है -
नैषा तर्केण मतिरापनेया
प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ
यां त्वम आपः सत्यधृतिर् बत असि
त्वादृङ नो भूयान् नचिकेतः प्रष्टा
सच्चाई यह है कि परमात्मा, परमेश्वर की प्राप्ति केवल व्याख्यान, तर्क और पांडित्य द्वारा नहीं हो सकती। केवल अपनी बुद्धि के द्वारा ही उसे समझा नहीं जा सकता। समस्त वैदिक साहित्यों का अध्ययन कर लेने पर भी कोई परमात्मा को समझ नहीं सकता। परन्तु यदि थोड़ी सी भी भगवान की कृपा मिल जाए, यदि भगवान प्रसन्न हो जाएँ तो इन्हें समझा जा सकता है। पर भगवान की कृपा पाने के अधिकारी कौन होते हैं ? भक्त मात्र। केवल वही परमात्मा को समझ सकते हैं। भगवान अपनी सेवा से प्रसन्न होकर भक्त को अपना दर्शन देते हैं - स्वयं एव स्फुरत्यदः। भगवान को केवल वेद वाक्यों के सहारे ही समझने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए न ही केवल तर्क-वितर्क द्वारा वेद वाक्यों की निन्दा करनी चाहिए।
