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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  2.6.87 
तोमार नाहिक दोष, शास्त्रे एइ कहे।
पाण्डित्याद्ये ईश्वर - तत्त्व - ज्ञान कभु नहे ॥87॥
 
 
अनुवाद
"यह तुम्हारा दोष नहीं है; यह शास्त्रों का निर्णय है। तुम केवल विद्वत्ता से भगवान को नहीं समझ सकते।"
 
"It's not your fault; it's the decision of the scriptures. You can't understand the Supreme Personality of Godhead through mere scholarship."
तात्पर्य
यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण श्लोक है। बड़े-बड़े विद्वान भी भगवान कृष्ण को नहीं समझ पाते पर वे भगवद्गीता की टीका करने का साहस करते हैं। भगवद्गीता पढ़ने का अर्थ भगवान कृष्ण को समझना है पर हम देखते हैं कि अनेक ज्ञानी भगवान कृष्ण को समझने की चेष्टा में बड़ी-बड़ी भूलें खा जाते हैं। गोपीनाथ आचार्य जी का कथन वैदिक साहित्य के अनेक स्थानों पर प्रतिपादित है। कठोपनिषद् (1.2.23) में कहा गया है -

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो

 न मेधया न बहुना श्रुतेन

यं एवैष वृणुते तेन लभ्यः

 तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम्

और कठोपनिषद् (1.2.9) में भी कहा गया है -

नैषा तर्केण मतिरापनेया

 प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ

यां त्वम आपः सत्यधृतिर् बत असि

 त्वादृङ नो भूयान् नचिकेतः प्रष्टा

सच्चाई यह है कि परमात्मा, परमेश्वर की प्राप्ति केवल व्याख्यान, तर्क और पांडित्य द्वारा नहीं हो सकती। केवल अपनी बुद्धि के द्वारा ही उसे समझा नहीं जा सकता। समस्त वैदिक साहित्यों का अध्ययन कर लेने पर भी कोई परमात्मा को समझ नहीं सकता। परन्तु यदि थोड़ी सी भी भगवान की कृपा मिल जाए, यदि भगवान प्रसन्न हो जाएँ तो इन्हें समझा जा सकता है। पर भगवान की कृपा पाने के अधिकारी कौन होते हैं ? भक्त मात्र। केवल वही परमात्मा को समझ सकते हैं। भगवान अपनी सेवा से प्रसन्न होकर भक्त को अपना दर्शन देते हैं - स्वयं एव स्फुरत्यदः। भगवान को केवल वेद वाक्यों के सहारे ही समझने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए न ही केवल तर्क-वितर्क द्वारा वेद वाक्यों की निन्दा करनी चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)