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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 78
 
 
श्लोक  2.6.78 
‘भट्टाचार्य’ तुमि इँहार ना जान महिमा ।
भगवत्ता - लक्षणेर इँहातेइ सीमा ॥78॥
 
 
अनुवाद
"हे प्रिय भट्टाचार्य, आप भगवान चैतन्य महाप्रभु की महानता को नहीं जानते। भगवान के सभी लक्षण उनमें सर्वोच्च स्तर पर पाए जाते हैं।"
 
"O Bhattacharya, you do not know the greatness of Sri Chaitanya Mahaprabhu. He possesses all the characteristics of godliness in their fullest extent."
तात्पर्य
चूँकि भट्टाचार्य एक अवैयक्तिक थे, इसलिए उन्हें अवैयक्तिक तेज से परे परम सत्य का कोई ज्ञान नहीं था। हालाँकि, गोपीनाथ आचार्य ने उन्हें सूचित किया कि चैतन्य महाप्रभु भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं। जो परम सत्य को जानते हैं, वे उसे तीन चरणों में जानते हैं, जैसा कि श्रीमद-भागवतम (1.2.11) में बताया गया है:

वदन्ति तत् तत्त्व-विद: तत्त्वं यज ज्ञानं अद्वयम

ब्रह्मेति परमात्मति भगवान इति शब्द्यते

"जो अद्वैत परम सत्य के ज्ञान में हैं, वे स्पष्ट रूप से जानते हैं कि ब्रह्म क्या है, परमात्मा क्या है, और भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व क्या है।" भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व षड-ऐश्वर्य-पूर्ण है, जो छह ऐश्वर्यों से पूर्ण है। गोपीनाथ आचार्य ने इस बात पर जोर दिया कि उन सभी छह ऐश्वर्यों का पूर्ण रूप से श्री चैतन्य महाप्रभु में अस्तित्व था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)