श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 76
 
 
श्लोक  2.6.76 
कहेन यदि, पुनरपि योग - पट्ट दिया ।
संस्कार करिये उत्तम - सम्प्रदाये आनिया ॥76॥
 
 
अनुवाद
तब सार्वभौम भट्टाचार्य ने सुझाव दिया, "यदि श्री चैतन्य महाप्रभु चाहें तो मैं उन्हें भगवा वस्त्र देकर तथा पुनः सुधार प्रक्रिया करके प्रथम श्रेणी के संप्रदाय में ला सकता हूँ।"
 
Then Sarvabhauma Bhattacharya suggested, “If Sri Chaitanya Mahaprabhu wishes, I will bring him into the higher order sect by giving him saffron robes and re-initiating him.”
तात्पर्य
भट्टाचार्य चाहते थे कि वह श्री चैतन्य महाप्रभु को सरस्वती संप्रदाय के रूप में पुनर्स्थापित करें क्योंकि उन्हें नहीं पसंद था कि यह भगवान का भारत संप्रदाय या पुरी संप्रदाय है। दरअसल, वह भगवान चैतन्य महाप्रभु की स्थिति नहीं जानते थे। ईश्वर के परम व्यक्तित्व के रूप में चैतन्य महाप्रभु किसी भी श्रेष्ठ या निम्न संप्रदाय के आश्रित नहीं है। ईश्वर का परम व्यक्तित्व हर परिस्थिति में सर्वोच्च स्थिति में रहता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)