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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 73
 
 
श्लोक  2.6.73 
गोपीनाथ कहे , - इँहार नाहि बाह्यापेक्षा ।
अतएव बड़ सम्प्रदायेर नाहिक अपेक्षा ॥73॥
 
 
अनुवाद
गोपीनाथ आचार्य ने उत्तर दिया, "श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु किसी बाह्य औपचारिकता पर निर्भर नहीं हैं। उन्हें किसी उच्चतर संप्रदाय से संन्यास लेने की कोई आवश्यकता नहीं है।"
 
Gopinatha Acharya replied, "Sri Krishna Chaitanya Mahaprabhu is not dependent on any external formalities. He does not need to take sannyasa from any superior sect."
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु ने सांकरेचार्य के शिष्य परिवारों में आने वाले भारती संप्रदाय (समुदाय) में संन्यास लिया। सांकरेचार्य ने अपने संन्यासी शिष्यों के नामों की एक सूची बनाई है जिसमें संख्या में दस हैं। इनमें से तीर्थ, आश्रम और सरस्वती को सर्वोपरि उपनाम माना जाता है। शृंगेरी के मठ में सरस्वती उपनाम को प्रथम श्रेणी, भारती द्वितीय श्रेणी और पुरी तृतीय श्रेण माना जाता है। एक संन्यासी जो "तत्त्वमसि" नारे को पूरी तरह से समझता हो और जो गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों के संगम पर स्नान करता हो उसे तीर्थ कहा जाता है। एक व्यक्ति जो संन्यास लेने के लिए बहुत उत्सुक है, जो सांसारिक गतिविधियों से अलग है, जिसकी किसी भी प्रकार की भौतिक सुविधाओं की कोई इच्छा नहीं है और जो इस प्रकार बार-बार जन्म और मृत्यु से मुक्त हो गया है, उसे आश्रम के रूप में जाना जाता है। जब एक संन्यासी जंगल में एक सुंदर, एकांत जगह में रहता है और सभी भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो जाता है, तो उसे वन कहा जाता है। एक संन्यासी जो हमेशा जंगल में रहता है और स्वर्गीय ग्रहों की ओर ऊंचा उठने के लिए दुनिया के सभी संबंधों को त्याग देता है, जहां वह नंदन-कानन में रह सकता है, उसे अरण्य कहा जाता है। जो भगवद-गीता के अध्ययन में संलग्न पहाड़ों में रहना पसंद करता है और जिसकी बुद्धि स्थिर है उसे गिरि कहा जाता है। जो दार्शनिक अटकलों के शिखर पर पहुंचने के लिए क्रूर जानवरों के बीच भी महान पहाड़ों में रहना पसंद करता है (यह समझते हुए कि इस भौतिक दुनिया का सार बेकार है) उसे पर्वत कहा जाता है। एक संन्यासी जिसने परम सत्य के सागर में डुबकी लगाई है और उस सागर से ज्ञान के कुछ मूल्यवान पत्थरों को एकत्र किया है, जो कभी भी संन्यासी के नियंत्रण सिद्धांतों से नहीं गिरता है, उसे सागर कहा जाता है। जिसने संगीत की शास्त्रीय कला सीखी है, जो इसकी संस्कृति में लगा हुआ है और जो विशेषज्ञ बन गया है और भौतिक आसक्ति से पूरी तरह से अलग हो गया है उसे सरस्वती कहा जाता है। सरस्वती संगीत और सीखने की देवी है, और एक हाथ में वह वीणा नामक एक वाद्य यंत्र रखती है। एक संन्यासी जो आध्यात्मिक उन्नति के लिए हमेशा संगीत में लगा रहता है उसे सरस्वती कहा जाता है। जो पूरी तरह से पढ़ा-लिखा हो गया है और सभी प्रकार के अज्ञान से मुक्त हो गया है और जो दुःखी स्थिति में भी कभी दुखी नहीं होता, उसे भारती कहा जाता है। जो निरपेक्ष ज्ञान में बहुत निपुण हो गया है, जो निरपेक्ष सत्य में स्थित है और जो हमेशा निरपेक्ष सत्य पर चर्चा करता है उसे पुरी कहा जाता है।

इन सभी संन्यासियों की ब्रह्मचारियों द्वारा सहायता की जाती है, जिनका वर्णन इस प्रकार है: जो अपनी वास्तविक पहचान जानता है और अपने विशेष व्यावसायिक कर्तव्य में निश्चित है, जो हमेशा आध्यात्मिक समझ में खुश रहता है, उसे स्वरूप-ब्रह्मचारी कहा जाता है। जो ब्रह्म तेज को पूरी तरह से जानता है और हमेशा योग के अभ्यास में लगा रहता है उसे प्रकाश-ब्रह्मचारी कहा जाता है। जिसने निरपेक्ष ज्ञान प्राप्त किया है और जो हमेशा परम सत्य, ज्ञान, असीमित और ब्रह्म तेज का ध्यान करता है, इस प्रकार खुद को अलौकिक आनंद में रखता है, उसे आनंद-ब्रह्मचारी कहा जाता है। जो पदार्थ और आत्मा के बीच अंतर करने में सक्षम है, जो भौतिक परिवर्तनों से कभी विचलित नहीं होता है और जो असीमित, अक्षय, शुभ ब्रह्म तेज का ध्यान करता है, वह प्रथम श्रेणी का, विद्वान ब्रह्मचारी है और उसे चैतन्य नाम दिया गया है।

जब सर्वभौम भट्टाचार्य श्री चैतन्य महाप्रभु के संन्यास समुदाय के बारे में गोपीनाथ आचार्य से बात कर रहे थे, तो उन्होंने पहले नाम "श्री कृष्ण" की सराहना की, लेकिन उपनाम "चैतन्य" को पसंद नहीं किया, जो भारती समुदाय के एक ब्रह्मचारी का नाम है। इसलिए उन्होंने सुझाव दिया कि भगवान को सरस्वती समुदाय में ऊपर उठाया जाए। हालाँकि, गोपीनाथ आचार्य ने बताया कि भगवान किसी बाहरी औपचारिकता पर निर्भर नहीं करते। गोपीनाथ आचार्य का दृढ़ विश्वास था कि श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं कृष्ण हैं और इसलिए किसी भी बाहरी अनुष्ठान या औपचारिकता से स्वतंत्र हैं। यदि कोई शुद्ध भक्ति सेवा में संलग्न होना चाहता है, तो उसे भारती या सरस्वती के रूप में नाममात्र की श्रेष्ठता की आवश्यकता नहीं है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)