श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 73
 
 
श्लोक  2.6.73 
गोपीनाथ कहे , - इँहार नाहि बाह्यापेक्षा ।
अतएव बड़ सम्प्रदायेर नाहिक अपेक्षा ॥73॥
 
 
अनुवाद
गोपीनाथ आचार्य ने उत्तर दिया, "श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु किसी बाह्य औपचारिकता पर निर्भर नहीं हैं। उन्हें किसी उच्चतर संप्रदाय से संन्यास लेने की कोई आवश्यकता नहीं है।"
 
Gopinatha Acharya replied, "Sri Krishna Chaitanya Mahaprabhu is not dependent on any external formalities. He does not need to take sannyasa from any superior sect."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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