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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 69
 
 
श्लोक  2.6.69 
‘प्रकृति - विनीत, सन्न्यासी देखिते सुन्दर ।
आमार बहु - प्रीति बाड़े इँहार उपर’ ॥69॥
 
 
अनुवाद
"संन्यासी स्वभाव से अत्यंत विनम्र और विनीत होते हैं, और उनका व्यक्तित्व देखने में अत्यंत सुंदर होता है। फलस्वरूप उनके प्रति मेरा स्नेह बढ़ता जाता है।"
 
"This monk is very humble and modest and is very handsome. As a result, my affection for him is growing."
तात्पर्य
सर्वभौम भट्टाचार्य ने श्री चैतन्य महाप्रभु को अति विनम्र और नम्र व्यक्तित्व माना क्योंकि यद्यपि चैतन्य महाप्रभु संन्यासी थे, फिर भी उन्होंने अपना ब्रह्मचारी नाम बनाए रखा था। भगवान ने भारतीय सम्प्रदाय में केशव भारती से संन्यास लिया था, जिसमें ब्रह्मचारी (संन्यासियों के सहायक) को "चैतन्य" कहा जाता है। संन्यास लेने के बाद भी चैतन्य महाप्रभु ने "चैतन्य" नाम रखा, जिसका अर्थ है एक संन्यासी का विनम्र सेवक। सर्वभौम भट्टाचार्य ने इस बात को बहुत सराहा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)