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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  2.6.56 
‘सहजेइ पूज्य तुमि, आरे त’ सन्न्यास ।
अतएव हङतोमार आमि निज - दास’ ॥56॥
 
 
अनुवाद
"आप स्वाभाविक रूप से आदरणीय हैं। इसके अलावा, आप एक संन्यासी हैं; इसलिए मैं आपका निजी सेवक बनना चाहता हूँ।"
 
"You are naturally my revered one. Besides, you are a monk, so I wish to become your personal slave."
तात्पर्य
एक संन्यासी को हमेशा गृहस्थ (घर के मालिक) के द्वारा पूजा और सभी प्रकार का सम्मान दिया जाना चाहिए। यद्यपि सर्वभौम भट्टाचार्य, श्री चैतन्य महाप्रभु से बड़े थे, परंतु सर्वभौम ने उनका सम्मान एक संन्यासी के रूप में किया जो आध्यात्मिक पुलक की सर्वोच्च सीढ़ी प्राप्त कर चुके थे। इस प्रकार, भट्टाचार्य ने निश्चित रूप से उन्हें अपना गुरु माना।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)