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श्लोक 2.6.264-265  |
कृष्णेर विग्रह येइ सत्य नाहि माने ।
येइ निन्दा - युद्धादिक करे ताँर सने ॥264॥
सेइ दुइर दण्ड हय - ‘ब्रह्म - सायुज्य - मुक्ति’ ।
तार मुक्ति फल नहे, येइ करे भक्ति ॥265॥ |
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| अनुवाद |
| भट्टाचार्य ने आगे कहा, "जो निर्विशेषवादी भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य रूप को स्वीकार नहीं करते, और जो राक्षस सदैव उनकी निन्दा और उनसे युद्ध में लगे रहते हैं, वे ब्रह्मतेज में विलीन होकर दण्डित होते हैं। किन्तु भगवान की भक्ति में लीन व्यक्ति के साथ ऐसा नहीं होता। |
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| Bhattacharya further said, "The impersonalists who do not believe in the divine form of Lord Krishna and the demons who criticize God and always fight with Him are punished by merging into Brahmajyoti. But this does not happen to the person who remains engaged in the devotional service of God." |
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