Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 263
 
 
श्लोक  2.6.263 
भट्टाचार्य कहे , - ‘भक्ति’ - सम नहे मुक्ति - फल ।
भगवद्भक्ति - विमुखेर हय दण्ड केवल ॥263॥
 
 
अनुवाद
सार्वभौम भट्टाचार्य ने उत्तर दिया, "भक्ति के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाला भगवान के प्रति शुद्ध प्रेम का जागरण, भवबंधन से मुक्ति से कहीं बढ़कर है। जो लोग भक्ति से विमुख हैं, उनके लिए ब्रह्मतेज में लीन होना एक प्रकार का दंड है।"
 
Sarvabhauma Bhattacharya replied, "The emergence of pure love for God, which is the fruit of devotion, is far greater than liberation from material bondage. For those who turn away from devotion, merging into the divine energy is a kind of punishment."
तात्पर्य
ब्रह्मांड पुराण में कहा गया है:

सिद्धलोकस्तु तमसः पारे यत्र वसन्ति हि

सिद्धा ब्रह्मसुखे मग्ना दैत्याश्च हरिणा हताः

"सिद्धलोक [ब्रह्मलोक] में दो प्रकार के जीव रहते हैं - वे जिन्हें भगवान के द्वारा मारा जाता है क्योंकि वे अपने पिछले जन्मों में दैत्य थे और वे जो भगवान के निराकार तेज का आनंद लेने के बहुत शौकीन हैं।" तमसः शब्द का अर्थ है "ब्रह्मांड का आवरण।" भौतिक तत्वों की परतें ब्रह्मांड को ढँकती हैं, और इन आवरणों के बाहर निराकार ब्रह्म का तेज है। अगर किसी को भगवान के निराकार तेज में रहना है, तो वह भगवान को सेवा करने का अवसर छोड़ देता है। इसलिए भक्त, निराकार ब्रह्म के तेज में रहने को एक प्रकार की सजा मानते हैं। कभी-कभी भक्त ब्रह्म तेज में विलय करने के बारे में सोचते हैं, और परिणामस्वरूप उन्हें सिद्धलोक में पदोन्नत किया जाता है। उनकी निराकार समझ के कारण, उन्हें वास्तव में दंडित किया जाता है। सर्वभौम भट्टाचार्य निम्नलिखित छंदों में मुक्ति-पद और भक्ति-पद के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)