| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 2: मध्य लीला » अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति » श्लोक 263 |
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| | | | श्लोक 2.6.263  | भट्टाचार्य कहे , - ‘भक्ति’ - सम नहे मुक्ति - फल ।
भगवद्भक्ति - विमुखेर हय दण्ड केवल ॥263॥ | | | | | | | अनुवाद | | सार्वभौम भट्टाचार्य ने उत्तर दिया, "भक्ति के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाला भगवान के प्रति शुद्ध प्रेम का जागरण, भवबंधन से मुक्ति से कहीं बढ़कर है। जो लोग भक्ति से विमुख हैं, उनके लिए ब्रह्मतेज में लीन होना एक प्रकार का दंड है।" | | | | Sarvabhauma Bhattacharya replied, "The emergence of pure love for God, which is the fruit of devotion, is far greater than liberation from material bondage. For those who turn away from devotion, merging into the divine energy is a kind of punishment." | | ✨ ai-generated | | |
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