यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्
“हे भारतवंशी, जब-जब और जहाँ-जहाँ धर्म की गिरावट होगी और अधर्म की प्रधानता बढ़ेगी - उस समय मैं स्वयं अवतरित होता हूँ।”
चैतन्य महाप्रभु के आविर्भाव के साथ भी ऐसा ही है। श्री चैतन्य महाप्रभु इस दुनिया में कृष्ण के एक छिपाव अवतार के रूप में आए थे, लेकिन उनके आविर्भाव की पुष्टि श्रीमद भागवतम्, महाभारत और अन्य वैदिक शास्त्रों में की गई है। वह इस भौतिक संसार में पतित आत्माओं को शिक्षित करने के लिए आए थे, क्योंकि कलियुग में लगभग हर कोई भोगवादी और अनुष्ठानवादी गतिविधियों और मानसिक अटकलों से जुड़ गया है। परिणामस्वरूप, भक्ति सेवा प्रणाली को पुनर्जीवित करने की एक बड़ी आवश्यकता थी। प्रभु स्वयं एक भक्त के रूप में छिपकर नीचे आए ताकि पतित जनता प्रभु के उदाहरण का लाभ उठा सके।
भगवद्-गीता के समापन पर, भगवान कृष्ण ने अपने भक्त को सभी सुरक्षा का वादा करते हुए उनके प्रति पूर्ण समर्पण की सलाह दी। दुर्भाग्य से, लोग इतने पतित हैं कि वे भगवान कृष्ण के निर्देशों को स्वीकार नहीं कर सकते; इसलिए कृष्ण उसी मिशन के साथ लौटे, लेकिन उन्होंने इसे एक अलग तरीके से निष्पादित किया। भगवान श्री कृष्ण के रूप में, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व, उन्होंने हमें स्वयं के प्रति समर्पण करने का आदेश दिया, लेकिन भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में, उन्होंने हमें सिखाया कि कृष्ण के प्रति समर्पण कैसे करें। इसलिए गोस्वामियों द्वारा उनकी प्रशंसा की जाती है: नमो महा-वदान्याय कृष्ण-प्रेम-प्रदाय ते। निश्चित रूप से भगवान श्री कृष्ण भगवान के व्यक्तित्व हैं, लेकिन वह श्री चैतन्य महाप्रभु जितने महान नहीं हैं। भगवान कृष्ण ने बस एक आदेश दिया था कि व्यक्ति उनके भक्त बने (मन-मन भाव मद्-भक्तः), लेकिन श्री चैतन्य महाप्रभु ने वास्तव में कृष्ण भावना की प्रक्रिया को बताया। यदि कोई कृष्ण का भक्त बनना चाहता है, तो उसे पहले सर्वभौम भट्टाचार्य और अन्य महान भक्तों के चरणों का अनुसरण करते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु के चरण कमलों की शरण लेनी चाहिए।
