श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 255
 
 
श्लोक  2.6.255 
कालान्नष्टं भक्ति - योगं निजं यः प्रादुष्कर्तुं कृष्ण - चैतन्य - नामा ।
आविर्भूतस्तस्य पादारविन्दे गाढं गाढं लीयतां चित्त - भृङ्गः ॥255॥
 
 
अनुवाद
"मेरी चेतना, जो मधुमक्खी के समान है, उन भगवान के चरणकमलों की शरण ग्रहण करे, जो अभी-अभी श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु के रूप में स्वयं को भक्ति की प्राचीन पद्धति सिखाने के लिए अवतरित हुए हैं। यह पद्धति समय के प्रभाव से लगभग लुप्त हो चुकी थी।"
 
"May my consciousness, like the honeybee, take refuge in the lotus feet of the Supreme Personality of Godhead, who has now appeared as Sri Krishna Chaitanya Mahaprabhu to teach me the ancient path of devotion to Him. This devotional practice has been lost due to the passage of time."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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