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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 242
 
 
श्लोक  2.6.242 
हरेर्नाम हरे र्नाम हरेर्नामैव केवलम् ।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥242॥
 
 
अनुवाद
"इस कलह और पाखंड के युग में, मुक्ति का एकमात्र साधन भगवान के पवित्र नामों का जाप है। इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है। इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है। इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है।"
 
"In this age of strife and pretense, the only means of salvation is chanting the holy name of the Lord. There is no other means, no other, no other."
तात्पर्य
क्योंकि इस युग के लोग पहले की तरह पतित नहीं हैं, वे मात्र हरे कृष्ण महामंत्र का जाप कर सकते हैं। इस तरह से वे अपने शारीरिक शरीर की अवधारणा से मुक्त हो सकते हैं और प्रभु की भक्ति करने के योग्य हो सकते हैं। कोई भी व्यक्ति बिना सभी दूषणों से मुक्त हुए भगवान की भक्ति नहीं कर सकता। इसकी पुष्टि भगवद-गीता में की गई है (7.28):

येषां त्व अन्त-गतं पापम जननाम पुण्य-कर्मणम

ते द्वन्द्व मोह निर्मुक्ता भजन्ते माम दृढ-व्रताह

" जो भी व्यक्ति अपने पिछले जीवन और इस जीवन में पुण्य कर्म करके, जिनका पापी कर्म पूर्ण रूप से उखाड़ फेंका गया है, वे द्वंद्व मोह से मुक्त होते हैं और निश्चल व्रत के साथ मेरी सेवा में जुड़ जाते हैं।" कभी कभी लोग यह देखकर बहुत हैरान हो जाते हैं कि युवा पुरुष और महिलाएं कृष्ण चेतना आंदोलन को इतना गंभीरता से लेते हैं। पापी कर्म - अवैध लैंगिक संबंध, मांसपेशी, नशा और जुआ को छोड़ कर - और आध्यात्मिक गुरु के निर्देशानुसार सख्ती से चलते हुए, वे सभी दूषण से मुक्त हो जाते हैं। इस प्रकार वे पूर्णतः भगवान की भक्ति में लिप्त हो जाते हैं।

इस कलियुग में, हरि कीर्तन बहुत ही महत्वपूर्ण है। श्रीमद् भागवतम (12.3.51-52) के निम्न श्लोकों में भगवान के पवित्र नाम को जाप करने के महत्व का उल्लेख किया गया है:

कलर दोष निधे राजन्न अति ह्य एको महान गुणह

कीर्तनाद एव कृष्णस्य मुक्त-संगः परमं व्रजेत

कृते यद् ध्यानतो विष्णुम त्रेतायां यजतो मखैह

द्वापारे परिचार्यायां कलौ तद धारि कीर्तनात

"कलियुग में जो दोषों का समुद्र है सबसे महत्वपूर्ण घटक यह है कि हम केवल हरे कृष्ण मंत्र का जाप करके सभी दूषणों से मुक्त होने और ईश्वर के राज्य में प्रवेश के योग्य हो सकते हैं। आत्मज्ञान जो कि सत्य युग में ध्यान द्वारा, त्रेता में विभिन्न यज्ञों के अनुष्ठान से और द्वापर युग में भगवान कृष्ण की पूजा से प्राप्त हुआ था, वह कलियुग में केवल हरे कृष्ण के पवित्र नामों के जाप से प्राप्त किया जा सकता है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)