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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 230
 
 
श्लोक  2.6.230 
“आजि मुञि अनायासे जिनिनु त्रिभुवन ।
आजि मुञि करिनु वैकुण्ठ आरोहण” ॥230॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "आज मैंने तीनों लोकों पर बड़ी सरलता से विजय प्राप्त कर ली है। आज मैं परमधाम पहुँच गया हूँ।"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu said, "Today I have conquered the three worlds with great ease. Today I have attained Vaikuntha."
तात्पर्य
मानवीय पूर्णता का लक्ष्य यहां संक्षेप में बताया गया है। भौतिक जगत की सभी ग्रह प्रणालियों से ऊपर उठाना पड़ता है, ब्रह्मांड के आवरण को भेदना पड़ता है और वैकुंठलोक के नाम से जाने जाने वाले आध्यात्मिक संसार तक पहुंचना पड़ता है। वैकुंठलोक ब्रह्मज्योति के नाम से जाने जाने वाले भगवान के अवैयक्तिक साकार तेज से स्थित विविध आध्यात्मिक ग्रह हैं। कोई भौतिक संसार के भीतर आकाशीय ग्रह, जैसे चंद्रमा, सूर्य या शुक्र पर खुद को ऊपर उठाने के लिए इच्छा कर सकता है, लेकिन अगर कोई कृष्ण चेतना में आध्यात्मिक रूप से उन्नत है, तो वह भौतिक जगत के भीतर रहने की इच्छा नहीं रखता है, यहां तक कि एक उच्च ग्रह प्रणाली में भी नहीं। बल्कि, वह ब्रह्मांड के आवरण को भेदना और आध्यात्मिक संसार को प्राप्त करना पसंद करता है। वह तब वहां के किसी वैकुंठ ग्रहों में स्थित हो सकता है। हालाँकि, श्री चैतन्य महाप्रभु के मार्गदर्शन में भक्त गोलोक वृंदावन नामक सर्वोच्च आध्यात्मिक ग्रह तक पहुंचने की आकांक्षा रखते हैं, जो भगवान श्री कृष्ण और उनके शाश्वत सहयोगियों का निवास स्थान है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)