श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 227
 
 
श्लोक  2.6.227 
देखि’ आनन्दित हैल महाप्रभुर मन ।
प्रेमाविष्ट ह ञा प्रभु कैला आलिङ्गन ॥227॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु यह देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। वे भगवान के प्रेम में विभोर हो गए और सार्वभौम भट्टाचार्य को गले लगा लिया।
 
Seeing this, Sri Chaitanya Mahaprabhu was extremely pleased. He was overwhelmed with love for the Lord and embraced Sarvabhauma Bhattacharya.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)