नव - विध अर्थ कैल शास्त्र - मत लञा ।
शुनि’ प्रभु कहे किछु ईषत् हासिया ॥190॥
Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93
Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
अनुवाद
भट्टाचार्य ने शास्त्रों के आधार पर आत्माराम श्लोक की नौ प्रकार से व्याख्या की। उनकी व्याख्या सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने हल्की-सी मुस्कान के साथ बोलना शुरू किया।
Bhattacharya explained the Atmaram verse in nine different ways, based on the scriptures. Hearing his explanation, Sri Chaitanya Mahaprabhu smiled and said.
तात्पर्य
आत्मारामा पद्य का विचार नैमिषारण्य में कई महान ऋषियों की बैठक में हुआ था, जिनकी अध्यक्षता शौनक ऋषि कर रहे थे। उन्होंने सभा की अध्यक्षता करने वाले श्रील सूत गोस्वामी से प्रश्न किया कि क्यों श्रील शुकदेव गोस्वामी, जो पहले से ही पारमहंस थे और अलौकिक स्थिति में थे, कृष्ण के गुणों की चर्चा की ओर आकर्षित थे। दूसरे शब्दों में, वे जानना चाहते थे कि श्री शुकदेव गोस्वामी श्रीमद्भागवतम् के अध्ययन में क्यों लगे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥