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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 190
 
 
श्लोक  2.6.190 
नव - विध अर्थ कैल शास्त्र - मत लञा ।
शुनि’ प्रभु कहे किछु ईषत् हासिया ॥190॥
 
 
अनुवाद
भट्टाचार्य ने शास्त्रों के आधार पर आत्माराम श्लोक की नौ प्रकार से व्याख्या की। उनकी व्याख्या सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने हल्की-सी मुस्कान के साथ बोलना शुरू किया।
 
Bhattacharya explained the Atmaram verse in nine different ways, based on the scriptures. Hearing his explanation, Sri Chaitanya Mahaprabhu smiled and said.
तात्पर्य
आत्मारामा पद्य का विचार नैमिषारण्य में कई महान ऋषियों की बैठक में हुआ था, जिनकी अध्यक्षता शौनक ऋषि कर रहे थे। उन्होंने सभा की अध्यक्षता करने वाले श्रील सूत गोस्वामी से प्रश्न किया कि क्यों श्रील शुकदेव गोस्वामी, जो पहले से ही पारमहंस थे और अलौकिक स्थिति में थे, कृष्ण के गुणों की चर्चा की ओर आकर्षित थे। दूसरे शब्दों में, वे जानना चाहते थे कि श्री शुकदेव गोस्वामी श्रीमद्भागवतम् के अध्ययन में क्यों लगे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)