श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 178
 
 
श्लोक  2.6.178 
भगवान् - ’सम्बन्ध’, भक्ति - ‘अभिधे य’ हय ।
प्रेमा - ‘प्रयोज न’, वेदे तिन - वस्तु कय ॥178॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, "परम पुरुषोत्तम भगवान् सभी संबंधों के केंद्रबिंदु हैं, उनकी भक्ति करना ही मनुष्य का वास्तविक कार्य है, और भगवान् के प्रेम की प्राप्ति ही जीवन का परम लक्ष्य है। वैदिक साहित्य में इन तीनों विषयों का वर्णन किया गया है।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu further said, "The Supreme Personality of Godhead is the center of all relationships; devotion to Him (abhidheya) is man's true duty, and attainment of love for the Lord is the ultimate goal (prayojana) of life. These three subjects are described in the Vedic literature."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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