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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 175
 
 
श्लोक  2.6.175 
‘तत्त्वम सि’ - जीव - हेतु प्रादेशिक वाक्य ।
प्रणव ना मा नि’ तारे कहे महा - वाक्य ॥175॥
 
 
अनुवाद
"तत्त्वम् असि [“तुम वही हो”] का गौण स्पंदन जीवात्मा की समझ के लिए है, लेकिन मुख्य स्पंदन ओंकार है। ओंकार की परवाह न करते हुए, शंकराचार्य ने तत्त्वम् असि स्पंदन पर बल दिया है।"
 
The secondary sound (territorial sentence) “Tattvamasi” (“You are the same”) is for the information about the living being, but the main sound is Omkar. Shankaracharya has emphasized on Tattvamasi sound without giving importance to Omkar.
तात्पर्य
तत् त्वम् असि को प्राथमिक स्पंदन के रूप में स्वीकार किया जाता है वह व्यक्ति जिसने वैदिक साहित्य का मुख्य सिद्धांत परमेश्वर के पवित्र नाम का पारलौकिक ध्वनि अवतार प्राणव को स्वीकार नहीं किया। शंकराचार्य ने शब्दों के बाजीगरी के साथ, जीवित संस्थाओं और ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति के साथ उनके संबंध में भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व का एक भ्रामक प्रस्तुति देने की कोशिश की। तत् त्वम् असि जीवित व्यक्ति को शरीर को आत्म के रूप में समझने की गलती न करने की चेतावनी दे रहा है। इसलिए तत् त्वम् असि विशेष रूप से वातानुकूलित आत्मा के लिए है। ओम्कार या हरे कृष्ण मंत्र का जप मुक्त आत्मा के लिए किया जाता है।श्रील रूपा गोस्वामी ने कहा है, अयि मुक्ता-कुलाईर उपास्यमानम (नामष्टक 1)। इस प्रकार भगवान के पवित्र नाम का जप मुक्त आत्माओं द्वारा किया जाता है। इसी तरह, परीक्षित महाराज कहते हैं, निवृत्त-तारसैर उपगियानत (भाग। 10.1.4)। भगवान के पवित्र नाम का जाप उन लोगों द्वारा किया जा सकता है जिन्होंने अपनी भौतिक इच्छाओं को पूरी तरह से संतुष्ट किया है या जो पूरी तरह से पारलौकिक मंच पर स्थित हैं और भौतिक इच्छा से रहित हैं। भगवान के नाम का जप वह कर सकता है जो भौतिक संदूषण से पूरी तरह से मुक्त है (अन्याभिलाषित-सुन्यम ज्ञान-कर्मादि-अनावृतम)। शंकराचार्य ने अप्रत्यक्ष रूप से सबसे महत्वपूर्ण वैदिक मंत्र (ओम्कार) के मूल्य को कम करके एक अधीनस्थ कंपन (तत् त्वम् असि) को सबसे महत्वपूर्ण वैदिक मंत्र के रूप में स्वीकार किया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)