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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 169
 
 
श्लोक  2.6.169 
जीवेर निस्तार ला गि’ सूत्र कैल व्यास ।
मायावादि - भाष्य शुनिले हय सर्वनाश ॥169॥
 
 
अनुवाद
“श्रील व्यासदेव ने बद्धजीवों के उद्धार के लिए वेदान्त दर्शन प्रस्तुत किया, किन्तु यदि कोई शंकराचार्य की व्याख्या सुनता है, तो सब कुछ बिगड़ जाता है।
 
“Srila Vyasdev presented Vedanta philosophy for the salvation of conditioned souls, but if a person listens to Shankaracharya's commentary, he is doomed to destruction.”
तात्पर्य
वास्तव में, वेदान्त-सूत्र में भगवान की भक्ति सेवा का वर्णन किया गया है, लेकिन मायावादी दार्शनिक, शंकरवादियों ने शारीरक-भाष्य नामक एक टीका तैयार की, जिसमें भगवान के पारलौकिक रूप को नकारा गया है। मायावादी दार्शनिक सोचते हैं कि जीव परम आत्मा ब्रह्म के समान है। वेदान्त-सूत्र पर उनकी टिप्पणियाँ भक्ति सेवा के सिद्धांत के बिल्कुल विपरीत हैं। इसलिए चैतन्य महाप्रभु हमें इन टिप्पणियों से बचने की चेतावनी देते हैं। यदि कोई शंकरवादी शारीरक-भाष्य को सुनने में लिप्त हो जाता है, तो वह निश्चित रूप से सभी वास्तविक ज्ञान से वंचित हो जाएगा।

महत्वाकांक्षी मायावादी दार्शनिक भगवान के अस्तित्व में विलय करना चाहते हैं, और इसे सायुज्य-मुक्ति के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। हालाँकि, मुक्ति का यह रूप अपने व्यक्तिगत अस्तित्व को नकारने का मतलब है। दूसरे शब्दों में, यह एक तरह की आध्यात्मिक आत्महत्या है। यह भक्ति-योग के दर्शन का पूरी तरह से विरोध है। भक्ति-योग व्यक्तिगत बद्ध आत्मा को अमरता प्रदान करता है। यदि कोई मायावादी दर्शन का पालन करता है, तो वह भौतिक शरीर को त्यागने के बाद अमर बनने का अपना अवसर गँवा देता है। व्यक्तिगत व्यक्ति की अमरता उच्चतम पूर्णतापूर्ण अवस्था है जिसे एक जीव प्राप्त कर सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)