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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 158
 
 
श्लोक  2.6.158 
सच्चिदानन्द - मय हय ईश्वर - स्वरूप ।
तिन अंशे चिच्छक्ति हय तिन रूप ॥158॥
 
 
अनुवाद
"परम पुरुषोत्तम भगवान अपने मूल रूप में शाश्वतता, ज्ञान और आनंद से परिपूर्ण हैं। इन तीन भागों [सत्, चित् और आनंद] में निहित आध्यात्मिक शक्ति तीन भिन्न रूप धारण करती है।
 
“In His original form the Supreme Personality of Godhead is full of eternity, knowledge and bliss. In these three parts (sat, chit, anand) the spiritual power takes three different forms.”
तात्पर्य
सभी वैदिक साहित्य के फैसले के अनुसार, भगवान्, जीव और माया (भौतिक संसार) ज्ञान का विषय है। सबको उनके बीच के संबंधों को समझने की कोशिश करनी चाहिए। सबसे पहले, भगवान के स्वरूप को समझने की कोशिश करनी चाहिए। शास्त्रों से हम समझते हैं कि भगवान का स्वरूप अनंत काल, सुख और ज्ञान का योग है। जैसे पद 154 (विष्णु-शक्तिः परा प्रोक्ता) में कहा गया है, भगवान सभी शक्तियों के भंडार हैं, और उनकी शक्तियां सभी आध्यात्मिक हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)