श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 158
 
 
श्लोक  2.6.158 
सच्चिदानन्द - मय हय ईश्वर - स्वरूप ।
तिन अंशे चिच्छक्ति हय तिन रूप ॥158॥
 
 
अनुवाद
"परम पुरुषोत्तम भगवान अपने मूल रूप में शाश्वतता, ज्ञान और आनंद से परिपूर्ण हैं। इन तीन भागों [सत्, चित् और आनंद] में निहित आध्यात्मिक शक्ति तीन भिन्न रूप धारण करती है।
 
“In His original form the Supreme Personality of Godhead is full of eternity, knowledge and bliss. In these three parts (sat, chit, anand) the spiritual power takes three different forms.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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