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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 154
 
 
श्लोक  2.6.154 
विष्णु - शक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्र - ज्ञाख्या तथा परा ।
अविद्या - कर्म - संज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥154॥
 
 
अनुवाद
"परम भगवान विष्णु की आंतरिक शक्ति आध्यात्मिक है, जैसा कि शास्त्रों द्वारा प्रमाणित है। एक और आध्यात्मिक शक्ति है, जिसे क्षेत्रज्ञ या जीवात्मा कहते हैं। तीसरी शक्ति, जिसे अविद्या कहते हैं, जीवात्मा को ईश्वरविहीन बनाती है और उसे सकाम कर्मों से परिपूर्ण करती है।
 
"As stated in the scriptures, Lord Vishnu's intrinsic power is spiritual. Another spiritual power is called Kshetrajna or Jiva. The third power is called Avidya, which makes the Jiva godless (Nirishvara) and fills him with fruitive actions."
तात्पर्य
भगवद् गीता में, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ पर भगवान श्री कृष्ण के उपदेशों में, यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि क्षेत्रज्ञ जीव ही है, जो अपनी कार्य क्षेत्र को जानता है। भौतिक जगत में जीव ईश्वर के साथ अपने शाश्वत सम्बंध को भूल गया है। यह विस्मृति ही अविद्या तथा अज्ञान है। अविद्या-शक्ति, भौतिक जगत की अविद्या प्रकृति, फलाश्रित क्रिया उत्पन्न करती है। यद्यपि यह अविद्या-शक्ति (भौतिक ऊर्जा अथवा अज्ञान) भी ईश्वर की ऊर्जा ही है, पर यह विशेष रूप से जीवों को विस्मृति की अवस्था में रखने के लिए है। यह प्रभु के विद्रोही भाव के कारण है। इस प्रकार यद्यपि जीव आध्यात्मिक रूप से गठित है, परन्तु यह अज्ञान की शक्ति के प्रभाव में आ जाता है। ऐसा कैसे होता है, यह निम्नलिखित श्लोक में वर्णित है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)