श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 151
 
 
श्लोक  2.6.151 
अतएव श्रुति कहे, ब्रह्म - सविशेष ।
‘मुख्य’ छाड़ि’ ‘लक्षणा’ते माने निर्विशेष ॥151॥
 
 
अनुवाद
“ये सभी मंत्र इस बात की पुष्टि करते हैं कि परम सत्य व्यक्तिगत है, लेकिन मायावादी प्रत्यक्ष अर्थ को त्यागकर परम सत्य की व्याख्या अवैयक्तिक के रूप में करते हैं।
 
“All these mantras confirm that the Absolute Truth is real, but the Mayavadis, abandoning the main meaning, interpret the Absolute Truth as formless or without speciality.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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