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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 151
 
 
श्लोक  2.6.151 
अतएव श्रुति कहे, ब्रह्म - सविशेष ।
‘मुख्य’ छाड़ि’ ‘लक्षणा’ते माने निर्विशेष ॥151॥
 
 
अनुवाद
“ये सभी मंत्र इस बात की पुष्टि करते हैं कि परम सत्य व्यक्तिगत है, लेकिन मायावादी प्रत्यक्ष अर्थ को त्यागकर परम सत्य की व्याख्या अवैयक्तिक के रूप में करते हैं।
 
“All these mantras confirm that the Absolute Truth is real, but the Mayavadis, abandoning the main meaning, interpret the Absolute Truth as formless or without speciality.”
तात्पर्य
जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, श्वेताश्वतर उपनिषद (3.19) में कहा गया है:

अपानि-पादो जवनो ग्रहीता

 पश्यत्य चाक्षुः स श्रृणोत्य अकर्णः

स वेत्ति वेद्यं न च तस्य अस्ति वेत्ता

 तम आहुर अग्रेयं पुरुषं महान्तम्

यह वैदिक मंत्र स्पष्ट रूप से बताता है, पुरुषं महान्तम्। पुरुष शब्द का अर्थ है "व्यक्ति"। भगवद्गीता (10.12) में अर्जुन पुष्टि करता है कि यह व्यक्ति कृष्ण है जब वह कृष्ण को पुरुषं शाश्वतम् कहकर बुलाता है: "तुम मूल व्यक्ति हो।" इस प्रकार श्वेताश्वतर उपनिषद के श्लोक में वर्णित पुरुषं महान्तम् श्री कृष्ण है। उनके हाथ और पैर सांसारिक नहीं हैं बल्कि पूरी तरह से दिव्य हैं। हालाँकि, जब वे आते हैं, तो मूर्ख उन्हें एक साधारण व्यक्ति (अवजानन्ति माँ मुधा मानुषीं तनुम् आश्रितम्) समझते हैं। जिसके पास वैदिक ज्ञान नहीं है, जिसने किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु से वेदों का अध्ययन नहीं किया है, वह कृष्ण को नहीं जानता। इसलिए वह एक मुधा है। ऐसे मूर्ख कृष्ण को एक साधारण व्यक्ति (परं भावम् अजानन्तः) मानते हैं। वे वास्तव में नहीं जानते कि कृष्ण क्या है। मनुष्याणाँ सहस्रषु कश्चिद यतति सिद्धये। केवल वेदों का पूर्ण रूप से अध्ययन करने से कृष्ण को समझना संभव नहीं है। किसी भक्त की कृपा होनी चाहिए (यत्-पादम्)। जब तक कोई भक्त के पक्षधर नहीं होता, वह भगवान की सर्वोच्च शक्‍ति को नहीं समझ सकता। अर्जुन भी भगवद्गीता (10.14) में इसकी पुष्टि करता है: "हे मेरे भगवान, आपके व्यक्तित्व को समझना बहुत कठिन है।" मनुष्यों का निम्न बुद्धिमान वर्ग, भक्त के पक्षधर हुए बिना भगवान की सर्वोच्च शक्‍ति को नहीं समझ सकता। इसलिए भगवद्गीता (4.34) में एक और आज्ञा है:

तद् विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नन सेवया

उपदेश्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानीनस् तत्त्व-दर्शिनः

किसी को प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के पास जाना होगा और उसके सामने आत्मसमर्पण करना होगा। उसके बाद ही कोई भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को एक व्यक्ति के रूप में समझ सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)