श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 145-146
 
 
श्लोक  2.6.145-146 
भगवान् बहु हैते यबे कैल मन ।
प्राकृत - शक्तिते तबे कैल विलोकन ॥145॥
से काले नाहि जन्मे ‘प्राकृत’ मनोनयन ।
अतएव ‘अप्राकृत’ ब्रह्मेर नेत्र - मन ॥146॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, "जब भगवान ने अनेक होने की इच्छा की, तो उन्होंने भौतिक शक्ति पर दृष्टि डाली। सृष्टि से पहले न तो कोई सांसारिक आँखें थीं और न ही मन; इसलिए परम सत्य के मन और नेत्रों की दिव्य प्रकृति की पुष्टि होती है।"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu continued, “When the Supreme Personality of Godhead desired to become many, He looked upon material nature. Before creation, material eyes or mind did not exist, thus confirming the transcendental nature of the mind and eyes of the Absolute Truth.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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