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अनुवाद
“ब्रह्माण्डीय अभिव्यक्ति में प्रत्येक वस्तु परम सत्य से निकलती है, परम सत्य में ही रहती है, तथा प्रलय के पश्चात् पुनः परम सत्य में ही प्रवेश कर जाती है।
Every object in this vast universe originates from the Supreme Truth, lives in it and after destruction, again enters the Supreme Truth.
तात्पर्य
तैत्तिरीय उपनिषद (3.1) में कहा है, यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते: "सम्पूर्ण भौतिक ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति परम ब्रह्म से उत्पन्न होती है।" इसके अलावा, ब्रह्म-सूत्र छंद से शुरू होता है जनम आद्य अस्य यतः: "परम सत्य वह है जिससे सब कुछ उत्पन्न होता है।" (बीएस. 1.1.2) वह परम सत्य कृष्ण है। भगवद्-गीता (10.8) में, कृष्ण कहते हैं, अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते: "मैं सभी आध्यात्मिक और भौतिक संसारों का स्रोत हूं। सब कुछ मुझसे निकलता है।" इसलिए कृष्ण मूल परम सत्य हैं, परमेश्वर के परम व्यक्तित्व। फिर, कृष्ण भगवद्-गीता (9.4) में कहते हैं, माया ततम् इदम सर्वं जगद अव्यक्त-मूर्तिना: "मेरे द्वारा, मेरे अव्यक्त रूप में, इस पूरे ब्रह्मांड की व्याप्ति है।" और जैसा कि ब्रह्म-संहिता (5.37) में पुष्टि की गई है, गोलोक एवा निवासत्य अखिलात्मा-भूतः: "हालांकि भगवान हमेशा अपने निवास, गोलोक वृंदावन में रहते हैं, फिर भी वे अभी भी सर्वव्यापी हैं।" उनकी सर्वव्यापी विशेषता को अवैयक्तिक माना जाता है क्योंकि उस सर्वव्यापकता में भगवान का रूप नहीं मिलता। दरअसल, सब कुछ उनके शारीरिक तेज की किरणों पर टिका है। ब्रह्म-संहिता (5.40) में भी कहा गया है:
यस्य प्रभा प्रभवतो जगद-अंड-कोटी-
-कोटिष्व अशेष-वसुधाधि-विभूति-भिन्नम्
भगवान के शारीरिक तेज की किरणों के कारण, लाखों ब्रह्मांड बनते हैं, जैसे ग्रह सूर्य से बनते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥