भगवद-गीता में, बहुत शुरुआत में कहा गया है:
धृतराष्ट्र उवाच
धर्म-क्षेत्रे कुरु-क्षेत्रे समवेता युयुत्सवः
मामकाः पाण्डवाश्चैव किम अकुर्वत संजय
भगवद-गीता के बयान स्वयं इस बात का सबूत हैं कि कुरुक्षेत्र नामक धार्मिक तीर्थ स्थल है जहाँ पाण्डव और कुरु युद्ध के लिए मिले थे। वहाँ मिलने के बाद, उन्होंने क्या किया? यह संजय से धृतराष्ट्र की जिज्ञासा थी। यद्यपि ये कथन बहुत स्पष्ट हैं, नास्तिक धर्म-क्षेत्र और कुरु-क्षेत्र शब्दों के विभिन्न अर्थों की व्याख्या करने की कोशिश करते हैं। इसलिए श्रील जीवा गोस्वामी ने हमें चेतावनी दी है कि किसी भी तरह की व्याख्या पर निर्भर न रहें। बिना व्याख्या के छंदों को लेना बेहतर है।
