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अनुवाद
सार्वभौम भट्टाचार्य ने विचार किया, "अधिरूढ़ भाव के असाधारण आनंदमय लक्षण श्री चैतन्य महाप्रभु के शरीर में प्रकट हो रहे हैं। यह बहुत अद्भुत है! ये लक्षण मनुष्य के शरीर में कैसे संभव हैं?"
Sarvabhauma Bhattacharya thought, "Extraordinary divine signs of the Adhirudha Bhava are manifesting in the body of Sri Chaitanya Mahaprabhu. This is astonishing! How is this possible in a human body?"
तात्पर्य
उज्जवल-नीलमणि में श्रील रूप गोस्वामी ने अधिरूढ़ भाव या अधिरूढ़-महाभाव की व्याख्या की है। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने रूप गोस्वामी को निम्न रूप से उद्धृत किया है: “आश्रय (भक्त) की प्रिय के प्रति प्रेम प्रवृत्ति इतनी उत्ताप्त हो जाती है कि प्रेमी को प्रियतम के संग का आनंद लेने के पश्चात् भी ऐसा लगता है कि उसका आनंद अपर्याप्त है। ऐसे समय में, प्रेमी प्रेयसी को विभिन्न तरीकों से देखता है। उत्ताप का ऐसा विकास अनुराग कहलाता है। जब अनुराग अपनी उच्चतम सीमा तक पहुँच जाता है और देह में प्रत्यक्ष हो जाता है, तो इसे भाव कहा जाता है। हालाँकि, जब शारीरिक लक्षण बहुत स्पष्ट नहीं होते हैं, तब भी भावात्मक स्थिति को अनुराग कहा जाता है, भाव नहीं। जब भाव उत्ताप तीव्र हो जाता है, तो इसे महा-भाव कहा जाता है। महा-भाव के लक्षण केवल गोपियों जैसे शाश्वत सहयोगियों के शरीर में ही दिखाई देते हैं।”
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥