Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 5: साक्षीगोपाल की लीलाएँ  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.5.32 
गोपालेर आगे विप्र कहिते लागिल ।
‘तुमि जान, निज - कन्या इहारे आमि दि ल’ ॥32॥
 
 
अनुवाद
गोपाल के सामने आकर वृद्ध ब्राह्मण ने कहा, “हे प्रभु, कृपया साक्षी दीजिए कि मैंने अपनी पुत्री इस लड़के को दे दी है।”
 
That old Brahmin came before Gopal and said, “O Lord, you are the witness that I have given my daughter to this boy.”
तात्पर्य
भारत में अब भी रिवाज है कि एक बेटी को केवल वचन से ही किसी को अर्पित किया जाता है। इसे वाक-दत्त कहते हैं। इसका मतलब है कि एक कन्या के पिता, भाई या अभिभावक ने वचन दिया है कि उसकी शादी एक निश्चित पुरुष से होगी। नतीजतन, वह बेटी किसी और से शादी नहीं कर सकती। वह पिता या अभिभावक के ईमानदार शब्दों के कारण आरक्षित है। ऐसे कई उदाहरण हैं जिनमें एक बच्ची के माता-पिता ने किसी को मौखिक वादा किया है कि उनकी बेटी की शादी उसके बेटे से होगी। दोनों पक्ष तब तक इंतजार करने के लिए सहमत हो जाते हैं जब तक कि लड़का और लड़की बड़े नहीं हो जाते, और फिर शादी हो जाती है। भारत में बहुत पुराने इस रिवाज के बाद, वृद्ध ब्राह्मण ने अपनी बेटी को छोटे ब्राह्मण को दान में देने का वादा किया, और उन्होंने गोपाल देवता के समक्ष यह वादा किया। भारत में देवता के समक्ष किए गए किसी भी वादे का सम्मान करने का रिवाज है। ऐसा वादा रद्द नहीं किया जा सकता। भारतीय गांवों में जब भी दो पक्षों में झगड़ा होता है, तो वे झगड़े को सुलझाने के लिए किसी मंदिर जाते हैं। देवता के सामने जो कुछ भी बोला जाता है, उसे सच माना जाता है, क्योंकि कोई भी देवता के सामने झूठ बोलने की हिम्मत नहीं करेगा। कुरुक्षेत्र की लड़ाई में भी यही सिद्धांत अपनाया गया था। इसलिए भगवद्-गीता के आरम्भ में ही कहा गया है: धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे।

ईश्वर के प्रति सचेत न होने से मानव समाज गिरकर पशु जीवन के निम्नतम स्तर पर पहुँच गया है। यह कृष्ण भावनामृत आन्दोलन आम जनता के बीच ईश्वर की चेतना को पुनर्जीवित करने के लिए बहुत आवश्यक है। यदि लोग वास्तव में ईश्वर के प्रति जागरूक हो जाते हैं, तो सारे झगड़े अदालत से बाहर निपटाए जा सकते हैं, जैसा कि उन दो ब्राह्मणों के मामले में हुआ था जिनकी असहमति का निपटारा गवाह गोपाल ने किया था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)