श्री चैतन्य महाप्रभु श्री कृष्ण हैं, जो भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं। इसलिए, यह कहा गया है, श्री-कृष्ण-चैतन्य, राधा-कृष्ण नाहे अन्य: "दो व्यक्तित्व - श्रीमती राधारानी और श्री कृष्ण - श्री चैतन्य महाप्रभु के अवतार में संयुक्त हैं।" इसलिए, श्री चैतन्य महाप्रभु को एक असाधारण व्यक्ति मानते हुए, भगवान नित्यानंद प्रभु ने परमहंस अवस्था की प्रतीक्षा नहीं की। उन्होंने तर्क दिया कि भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व स्वतः ही परमहंस अवस्था में है; इसलिए उसे सन्यास-दण्ड ले जाने की आवश्यकता नहीं है। यही कारण है कि श्री नित्यानंद प्रभु ने दंड को तीन टुकड़ों में तोड़कर पानी में फेंक दिया।
