मनुष्य सभ्यता की पूर्णता कृष्ण भक्ति पर निर्भर करती है, जो देवता पूजा की सिफारिश करती है। सब्जियों, अनाज, दूध, घी और दही से बना भोजन भगवान को चढ़ाया जाता है और फिर बांटा जाता है। यहाँ हम पूर्व और पश्चिम के बीच का फर्क देख सकते हैं। जो लोग गोपाल भगवान देखने आए थे, वो भगवान को चढ़ाने के लिए कई तरह का भोजन लेकर आए थे। वे जितना भी खाद्य सग्रह था, उसे ले आए, और वे भगवान के सामने आए; केवल अपने लिए प्रसाद लेने ही नहीं बल्कि उसे औरों में बांटने के लिए भी। कृष्ण भक्ति आंदोलन भोजन बनाने, उसे भगवान को चढाने और जनता में बांटने की इस प्रथा को जोर-शोर से स्वीकारता है। इस गतिविधि को व्यापक रूप से बुरे खान-पान और केवल राक्षसों के लिए उपयुक्त व्यवहार को रोकने के लिए बढ़ाया जाना चाहिए। राक्षसी सभ्यता दुनिया में कभी शांति नहीं लाएगी। चूँकि इंसानी समाज में खाने की प्राथमिक आवश्यकता होती है, इसलिए खाने को तैयार करने और बांटने की समस्याओं को सुलझाने वालों को माधवेंद्र पुरी से सीख लेकर अन्नकूट समारोह का आयोजन करना चाहिए। जब लोग सिर्फ देवता को चढाया हुआ प्रसाद ही खाने लगेंगे, तो सारे राक्षस वैष्णव बन जाएँगे। जब लोग कृष्ण भक्त होंगे, तो स्वाभाविक ही सरकार भी वैसी ही होगी। कृष्ण भक्त हमेशा सभी का उदार शुभचिंतक होता है। जब ऐसे लोग सरकार का नेतृत्व करते हैं, तो लोग अवश्य ही पापरहित होंगे। वे अब परेशान करने वाले राक्षस नहीं रहेंगे। तभी और तभी समाज में शांति की स्थिति बन सकती है।
