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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 4: श्री माधवेन्द्र पुरी की भक्ति  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  2.4.93 
अन्न, घृत, दधि, दुग्ध, - ग्रामे यत छिल ।
गोपालेर आगे लोक आनिया धरिल ॥93॥
 
 
अनुवाद
गांव के निवासियों ने गोपाल के विग्रह के लिए उतना ही अन्न, घी, दही और दूध लाया, जितना उनके गांव में था।
 
All the residents of the village brought all the food grains, ghee, curd and milk to offer to the idol of Gopal.
तात्पर्य
अन्न, घृत, दधि और दुग्ध अनाज, घी, दही और दूध हैं। वास्तव में ये सभी भोजन का आधार हैं। सब्जियां और फल सहायक हैं। अनाज, सब्जियों, घी, दूध और दही से सैकड़ों और हजारों व्यंजन बनाए जा सकते हैं। अन्नकूट समारोह में गोपाल को जो भोजन चढ़ाया गया था, उसमें केवल ये पांच सामग्री थी। केवल राक्षसी प्रवृत्ति के लोग ही दूसरे प्रकार के भोजन की ओर आकर्षित होते हैं, जिनका हम यहाँ उल्लेख भी नहीं करेंगे। हमें यह समझना चाहिए कि पौष्टिक भोजन बनाने के लिए हमें केवल अनाज, घी, दही और दूध की जरूरत होती है। हम ईश्वर को इसके अतिरिक्त कुछ और नहीं चढ़ा सकते। वैष्णव, जो कि सही इंसान होते हैं, वह वह कुछ भी स्वीकार नहीं करते, जो ईश्वर को चढ़ाया न गया हो। लोग अक्सर राष्ट्रीय खाद्य नीतियों से निराश हो जाते हैं, लेकिन वैदिक शास्त्रों से हमें पता चलता है कि यदि गायें और अनाज पर्याप्त हैं, तो खाने की समस्या हल हो जाती है। इसलिए वैश्य (जो व्यापार या कृषि के काम को) भगवद गीता में अनाज पैदा करने और गायों की रक्षा की सलाह दी गयी है। गायें सबसे महत्वपूर्ण जानवर हैं क्योंकि वे चमत्कारिक भोजन, दूध, का उत्पादन करती हैं, जिससे हम घी और दही बना सकते हैं।

मनुष्य सभ्यता की पूर्णता कृष्ण भक्ति पर निर्भर करती है, जो देवता पूजा की सिफारिश करती है। सब्जियों, अनाज, दूध, घी और दही से बना भोजन भगवान को चढ़ाया जाता है और फिर बांटा जाता है। यहाँ हम पूर्व और पश्चिम के बीच का फर्क देख सकते हैं। जो लोग गोपाल भगवान देखने आए थे, वो भगवान को चढ़ाने के लिए कई तरह का भोजन लेकर आए थे। वे जितना भी खाद्य सग्रह था, उसे ले आए, और वे भगवान के सामने आए; केवल अपने लिए प्रसाद लेने ही नहीं बल्कि उसे औरों में बांटने के लिए भी। कृष्ण भक्ति आंदोलन भोजन बनाने, उसे भगवान को चढाने और जनता में बांटने की इस प्रथा को जोर-शोर से स्वीकारता है। इस गतिविधि को व्यापक रूप से बुरे खान-पान और केवल राक्षसों के लिए उपयुक्त व्यवहार को रोकने के लिए बढ़ाया जाना चाहिए। राक्षसी सभ्यता दुनिया में कभी शांति नहीं लाएगी। चूँकि इंसानी समाज में खाने की प्राथमिक आवश्यकता होती है, इसलिए खाने को तैयार करने और बांटने की समस्याओं को सुलझाने वालों को माधवेंद्र पुरी से सीख लेकर अन्नकूट समारोह का आयोजन करना चाहिए। जब लोग सिर्फ देवता को चढाया हुआ प्रसाद ही खाने लगेंगे, तो सारे राक्षस वैष्णव बन जाएँगे। जब लोग कृष्ण भक्त होंगे, तो स्वाभाविक ही सरकार भी वैसी ही होगी। कृष्ण भक्त हमेशा सभी का उदार शुभचिंतक होता है। जब ऐसे लोग सरकार का नेतृत्व करते हैं, तो लोग अवश्य ही पापरहित होंगे। वे अब परेशान करने वाले राक्षस नहीं रहेंगे। तभी और तभी समाज में शांति की स्थिति बन सकती है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)