ऐसे योग्य ब्राह्मण के लिए देवता की पूजा करने के लिए, उसे वैष्णव होना चाहिए। इस प्रकार वैष्णव का पद ब्राह्मण से श्रेष्ठ है। माधवेंद्र पुरी द्वारा दिया गया यह उदाहरण इस बात की पुष्टि करता है कि भले ही कोई ब्राह्मण कितना भी कुशल हो, वह तब तक विष्णु-मूर्ति का पुजारी या सेवक नहीं बन सकता जब तक कि उसे वैष्णव-मंत्र में दीक्षित नहीं किया जाता। गोपाल की मूर्ति स्थापित करने के बाद, माधवेंद्र पुरी ने सभी ब्राह्मणों को वैष्णव धर्म में दीक्षा दी। फिर उन्होंने ब्राह्मणों को देवता की विभिन्न प्रकार की सेवाएँ सौंपीं। प्रातः चार बजे से रात्रि दस बजे तक (मंगल-आरती से शयन-आरती तक) देवता की देखभाल के लिए कम से कम पाँच या छह ब्राह्मण होने चाहिए। मंदिर में छह आरतीयां की जाती हैं, और अक्सर देवता को भोजन चढ़ाया जाता है और प्रसाद बांटा जाता है। पूर्ववर्तियों द्वारा निर्धारित नियमों और विनियमों के अनुसार देवता की पूजा करने की यही विधि है। हमारा संप्रदाय माधवेंद्र पुरी के शिष्य उत्तराधिकार से संबंधित है, जो माध्व-सम्प्रदाय के थे। हम श्री चैतन्य महाप्रभु के शिष्य उत्तराधिकार में हैं, जिन्हें श्री ईश्वर पुरी ने दीक्षित किया था, जो माधवेंद्र पुरी के शिष्य थे। इसलिए हमारे संप्रदाय को माध्व-गौड़ीय-सम्प्रदाय कहा जाता है। जैसे, हमें श्री माधवेंद्र पुरी के नक्शे कदम पर सावधानीपूर्वक चलना चाहिए और ध्यान देना चाहिए कि उन्होंने गोवर्धन पहाड़ी की चोटी पर गोपाल देवता को कैसे स्थापित किया, उन्होंने केवल एक दिन में अन्नकूट समारोह की व्यवस्था और संचालन कैसे किया, और इसी तरह। अमेरिका और यूरोप के धनी देशों में देवताओं की हमारी स्थापना श्री माधवेंद्र पुरी की गतिविधियों के अनुसार की जानी चाहिए। देवता के सभी सेवक ब्राह्मण के रूप में सख्ती से योग्य होने चाहिए और विशेष रूप से, अधिक से अधिक प्रसाद चढ़ाने और मंदिर में प्रभु के दर्शन करने वाले भक्तों को वितरित करने की वैष्णव प्रथा में संलग्न होना चाहिए।
