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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 4: श्री माधवेन्द्र पुरी की भक्ति  »  श्लोक 79
 
 
श्लोक  2.4.79 
एक - दिनेर उद्योगे ऐछे महोत्सव कैल ।
गोपाल प्रभावे हय, अन्ये ना जानिल ॥79॥
 
 
अनुवाद
श्रीगोपालजी का अद्भुत उत्सव और स्थापना एक ही दिन में सम्पन्न हुई। निश्चय ही यह सब गोपालजी की शक्ति से ही सम्पन्न हुआ। इसे भक्त के अलावा कोई नहीं समझ सकता।
 
This amazing festival and the installation of Shri Gopalji were both arranged in a single day. Undoubtedly, all this was possible only through the power of Gopal. No one except the devotees can understand this.
तात्पर्य
कम समय में (पाँच वर्ष के अंदर) कृष्ण भक्ति आंदोलन दुनिया भर में फैल गया है| इस बात से सांसारिक लोग आश्चर्यचकित हैं| यद्यपि| भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से| हम समझते हैं कि कृष्ण की कृपा से सब कुछ संभव है| कृष्ण को पाँच वर्ष क्यों लगेंगे? पाँच दिनों में ही वह अपनी कीर्ति और प्रसिद्धि चारों ओर प्रकाश की तरह फैला सकते हैं| जिनकी कृष्ण पर श्रद्धा और भक्ति है| वे समझ सकते हैं कि यह सब श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से कितना आश्चर्यजनक रूप से होता है| हम मात्र उपकरण है| कुरुक्षेत्र की भीषण लड़ाई में| अर्जुन अठारह दिनों में केवल इसलिए विजयी हुआ क्योंकि कृष्ण की कृपा उसके पक्ष में थी|

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः

तत्र श्रीर् विजयो भूतिर् ध्रुवा नीतिर्मतिर् मम

" जहाँ कृष्ण हैं, सब सिद्धों में श्रेष्ठ योगेश्वर हैं| और जहाँ अर्जुन हैं, सर्वोच्च धनुर्धारी है| वही अचूक रूप से वैभव| विजय| असाधारण शक्ति और सदाचार होते हैं| यह मेरा मानना है|" (भ गी 18.78)

यदि हमारे कृष्ण चेतना आंदोलन के प्रचारक कृष्ण के निष्ठावान भक्त हैं तो कृष्ण हमेशा उनके साथ रहेंगे| क्योंकि वे अपने सभी भक्तों पर बहुत दयालु और प्रसन्न होते हैं| जैसे कि अर्जुन और कृष्ण कुरुक्षेत्र के युद्ध में विजयी हुए थे| इसी प्रकार कृष्ण चेतना आंदोलन अवश्य ही विजयी होगा| केवल यदि हम भगवान के निष्ठावान भक्त बने रहेंगे और भगवान की सेवा पहले के लोगों (छः गोस्वामी और भगवान के अन्य भक्तों) की सलाह के अनुसार करेंगे| जैसा कि नरहरि दास टक्कुर ने कहा है| : ताँदेरा चरण सेवी भक्त -सने वासा, जन्म जन्म हाय एइ अभिलाषा| कृष्ण चेतना के भक्तों को हमेशा भक्तों की संगति में रहने की चाहत रखनी चाहिए| भक्त-सने वासा : वे कृष्ण चेतना समाज या आंदोलन से बाहर नहीं जा सकते| समाज के भीतर हमें चाहिए कि चैतन्य महाप्रभु का पंथ प्रचारित करके और उनके नाम और प्रसिद्धि को पूरी दुनिया में फैलाकर पहले के लोगों की सेवा करने का प्रयास करें| यदि हम इस समाज के भीतर इस बात का गंभीरता से प्रयास करते हैं तो यह सफलतापूर्वक घटित होगा| ऐसा सांसारिक दृष्टि में कैसे होगा, इसका अनुमान लगाने का प्रश्न ही नहीं है| परंतु बिना किसी संदेह के, यह कृष्ण की कृपा से ही होता है|

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)