पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति
तदहं भक्त्य-उपहृतं अश्नामि प्रयतात्मनः
"यदि कोई मेरे लिए भक्ति और आभार के साथ एक पत्ता, फूल, फल या पानी प्रदान करता है, तो मैं इसे स्वीकार करूँगा।" भगवान् पूर्ण हैं, और इसलिए वह अपने भक्तों द्वारा अर्पित हर चीज़ खाते हैं। हालाँकि, उनके दिव्य हाथ के स्पर्श से, सारा भोजन बिल्कुल वैसा ही रहता है जैसा पहले था। उसमें सिर्फ गुणों में परिवर्तन आता है। भोजन के अर्पित होने से पहले, यह कुछ और था, लेकिन अर्पित किए जाने के बाद भोजन में एक दिव्य गुण आ जाता है। क्योंकि भगवान् पूर्ण हैं, खाने के बाद भी वे वही रहते हैं। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते। कृष्ण को अर्पित भोजन गुणात्मक रूप से कृष्ण जितना ही अच्छा होता है; जिस तरह कृष्ण अव्यय हैं, अविनाशी हैं, उसी तरह कृष्ण द्वारा खाया गया भोजन, उनके समान होने के कारण, पहले जैसा ही रहता है।
इसके अलावा, कृष्ण किसी भी एक दिव्य इंद्रिय से भोजन कर सकते हैं। वे भोजन को देखकर या उसे छूकर खा सकते हैं। न ही यह सोचना चाहिए कि कृष्ण के लिए खाना ज़रूरी है। वह एक साधारण मनुष्य की तरह भूखा नहीं होते; फिर भी, वह स्वयं को भूखा होने के रूप में प्रस्तुत करते हैं, और इस तरह, वे मात्रा की परवाह किए बिना, खा सकते हैं। कृष्ण के खाने के पीछे का दर्शन हमारी दिव्य इंद्रियों द्वारा समझा जा सकता है। जब हमारी इंद्रियों को भगवान की भक्ति सेवा में निरंतर व्यस्त रहने से शुद्ध किया जाता है, तो हम कृष्ण की गतिविधियों, नामों, रूपों, गुणों, लीलाओं और अनुचर को समझ सकते हैं।
अतः श्री-कृष्ण-नामादि न भवेद् ग्राह्यम इन्द्रियैः
सेवनमुखे हि जिह्वादौ स्वयं एव स्फुरत्यदः
"कोई भी कृष्ण को भौतिक इंद्रियों से नहीं समझ सकता। परंतु वह भक्तों को प्रकट होते हैं, उनके प्रति उनकी दिव्य प्रेममयी सेवा के लिए प्रसन्न होकर।" (भक्ति-रसामृत-सिंधु 1.2.234) भक्त कृष्ण को रहस्योद्घाटन के माध्यम से समझते हैं। एक सांसारिक विद्वान के लिए केवल भक्ति के मंच पर अनुसंधान कार्य के माध्यम से कृष्ण और उनके लीलाओं को समझना संभव नहीं है।
