श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 4: श्री माधवेन्द्र पुरी की भक्ति  »  श्लोक 210
 
 
श्लोक  2.4.210 
गोपाल - गोपीनाथ - पुरी - गोसाञि र गुण ।
भक्त - सङ्गे श्री - मुखे प्रभु कैला आस्वादन ॥210॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु ने गोपालजी, गोपीनाथ और श्री माधवेन्द्र पुरी के दिव्य गुणों का साक्षात् अपने मुख से आस्वादन किया।
 
In this way, Chaitanya Mahaprabhu himself tasted the divine qualities of Gopalji, Gopinath and Shri Madhavendra Puri with his own mouth.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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