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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 4: श्री माधवेन्द्र पुरी की भक्ति  »  श्लोक 202
 
 
श्लोक  2.4.202 
कम्प, स्वेद, पुलकाश्रु, स्तम्भ, वैवर्ण्य ।
निर्वेद, विषाद, जाड्य, गर्व, हर्ष, दैन्य ॥202॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु के शरीर में कम्पन, पसीना, हर्ष के आंसू, सदमा, शारीरिक कांति का लुप्त होना, निराशा, उदासी, स्मृतिलोप, गर्व, हर्ष और विनम्रता, ये सभी भाव स्पष्ट दिखाई दे रहे थे।
 
Shivering, sweating, tears of joy, stupor, discoloration of the body, despair, sadness, loss of memory, pride, joy and humility - all these symptoms were visible in the body of Sri Chaitanya Mahaprabhu.
तात्पर्य
भक्ति रसामृत सिंधु में, जाड़्य को अत्यंत सदमे के कारण आई विस्मृति के रूप में परिभाषित किया गया है जो प्रिय के वियोग के कारण होती है। मन की उस अवस्था में, मनुष्य हानि-लाभ, सुनना-देखना तथा अन्य सभी विचारों के प्रति अपनी चिंता खो देता है। यह भ्रम की प्रारंभिक अवस्था को चिह्नित करता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)