श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 4: श्री माधवेन्द्र पुरी की भक्ति  »  श्लोक 200
 
 
श्लोक  2.4.200 
प्रेमोन्माद हैल, उठि’ इति - उति धाय ।
हुङ्कार करये, हासे, कान्दे, नाचे, गाय ॥200॥
 
 
अनुवाद
भगवान आनंदित भाव प्रकट करते हुए इधर-उधर दौड़ने लगे, गूँजती हुई ध्वनियाँ निकालने लगे। कभी हँसते, कभी रोते, कभी नाचते और गाते।
 
In a display of love, Mahaprabhu ran here and there, roaring. Sometimes he laughed, sometimes wept, sometimes danced, and sometimes sang.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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