श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 4: श्री माधवेन्द्र पुरी की भक्ति  »  श्लोक 194
 
 
श्लोक  2.4.194 
एइ श्लोक कहियाछेन राधा - ठाकुराणी ।
ताँर कृपाय स्फुरियाछे माधवेन्द्र - वाणी ॥194॥
 
 
अनुवाद
वास्तव में यह श्लोक स्वयं श्रीमती राधारानी द्वारा कहा गया था, और उनकी कृपा से ही यह माधवेन्द्र पुरी के शब्दों में प्रकट हुआ।
 
In fact, this verse was spoken by Srimati Radharani herself and it was by her grace that it appeared in the words of Madhavendra Puri.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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