श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 4: श्री माधवेन्द्र पुरी की भक्ति  »  श्लोक 186
 
 
श्लोक  2.4.186 
प्रगाढ़ - प्रेमेर एइ स्वभाव - आचा र ।
निज - दुःख - विघ्नादिर ना करे विचार ॥186॥
 
 
अनुवाद
"यह भगवान के प्रति प्रगाढ़ प्रेम का स्वाभाविक परिणाम है। भक्त व्यक्तिगत असुविधाओं या बाधाओं का विचार नहीं करता। वह सभी परिस्थितियों में भगवान की सेवा करना चाहता है।"
 
"This is the natural result of intense love for God. The devotee does not consider personal inconveniences or obstacles. He desires to serve the Lord under all circumstances."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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