श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 4: श्री माधवेन्द्र पुरी की भक्ति  »  श्लोक 170
 
 
श्लोक  2.4.170 
श्री - मुखे माधव - पुरीर अमृत - चरित ।
भक्त - गणे शुनाञा प्रभु करे आस्वादित ॥170॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं माधवेन्द्र पुरी के अमृतमय गुणों की प्रशंसा की और जब उन्होंने भक्तों को यह सब बताया तो उन्होंने स्वयं इसका आनन्द लिया।
 
In this way Sri Chaitanya Mahaprabhu himself praised the nectar-like qualities of Madhavendra Puri and while he was narrating all this to the devotees, he himself also tasted it.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)