ग्रीष्म - काल - अन्ते पुनः नीलाचले गेला ।
नीलाचले चातुर्मास्य आनन्दे रहिला ॥169॥
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अनुवाद
ग्रीष्म ऋतु के अंत में माधवेन्द्र पुरी जगन्नाथ पुरी लौट आये, जहाँ वे चतुर्मास की पूरी अवधि के दौरान बड़े आनंद के साथ रहे।
At the end of the summer, Madhavendra returned to Puri Jagannath Puri, where he spent the Chaturmasya with great joy.
तात्पर्य
चातुर्मास्य काल आषाढ़ (जून-जुलाई) महीने में शुक्ल पक्ष की एकादशी से आरंभ होता है, जिसे शयना-एकादशी कहते हैं। कातृ्तिक (अक्टूबर-नवंबर) माह में शुक्ल पक्ष की एकादशी को उठान-एकादशी कहते हैं और इसी दिन इसकी समाप्ति होती है। ये चार महीनों का काल चातुर्मास्य कहलाता है। कुछ वैष्णव इसे आषाढ़ की पूर्णिमा से कार्तिक की पूर्णिमा तक भी मानते हैं। यह भी चार माह का काल होता है। चान्द्र मासों के अनुसार गणना किए गए इस काल को चातुर्मास्य कहते हैं, पर कुछ लोग श्रावण से कार्तिक तक सौर मास के अनुसार भी चातुर्मास्य मनाते हैं। यह सारा काल, चाहे चान्द्र हो या सौर, वर्षा के दिनों में ही पड़ता है। चातुर्मास्य का पालन समाज के सभी वर्गों के लोगों को करना चाहिए। गृहस्थ हों या सन्यासी, इससे कोई मतलब नहीं। सभी आश्रमों के लिए इसका पालन अनिवार्य है। इन चार माह के दौरान लिए गए व्रत का वास्तविक उद्देश्य इन्द्रिय-तृप्ति को न्यून करना है। यह कोई बहुत कठिन बात नहीं। श्रावण महीने में पालक नहीं खाना चाहिए, भाद्रपद महीने में दही नहीं लेना चाहिए तथा आश्विन महीने में दूध नहीं पीना चाहिए। कार्तिक महीने में मछली और अन्य मांसाहार नहीं लेना चाहिए। मांसाहार में माछ-मांस ही नहीं, बल्कि मसूर की दाल तथा उड़द की दाल भी आती है। इन दोनों दालों में मात्रा से अधिक प्रोटीन होता है और प्रोटीन युक्त भोजन को मांसाहार माना गया है। कुल मिलाकर, चातुर्मास्य के चार माह के काल में इन्द्रियरुचि के लिए बनाए गए सभी प्रकार के भोजन का परित्याग करने का अभ्यास करना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥